तुंगनाथ (तृतीय केदार) दर्शन

मध्यमहेश्वर की सुखद यात्रा ने हमारे हौंसले बढ़ा दिए थे, यूँ तो हम यहीं तक का टूर बनाकर आये थे, पर सोचा एक केदार के और दर्शन कर लेते हैं। पता चला तुंगनाथ पास में ही हैं, एक दिन में ही लौट आएंगे सो आनन-फानन में वहाँ जाने का कार्यक्रम बना लिया और ड्राइवर को बताया तो पहले तो वह ड्रामा करने लगा बाद में डेढ़ हजार रुपया ज्यादा लेकर खुशी-खुशी जाने को तैयार हो गया। 🙂
अगले दिन सभी तीन बजे उठ गए। हमने कल रात ही होटल वाले अशोक को बता दिया था की सुबह पांच बजे निकल जाएंगे। असल में अशोक रात को यहाँ नहीं रहता था अपने गाँव रांसी में घर चला जाता था। हमने उससे सुबह चाय के लिए मना कर दिया था सो नहाकर तैयार होकर निकलने वाले ही थे कि दूर से अशोक आता दिखाई दिया। हम उसके लिए रुके और उसके आने पर उसके आतिथ्य के लिए उसका धन्यवाद किया और प्रशंसा भी की। सच में उसका सेवा-सत्कार हमेशा याद रहेगा।
सुबह सड़कें खाली थीं और नीचे उतरना था सो ड्राइवर गाड़ी दौड़ा रहा था हम सभी को चाय की हुड़क उठ रही थी सो हमने उससे किसी चाय की दुकान पर गाड़ी रोकने को कहा था कि कुछ दूर जाते ही गाड़ी का पहिया पंचर हो गया 🙂 वह हम सब को सड़क किनारे बने रेस्त्रां में छोड़कर पंचर लगवाने चला गया। रेस्त्रां में अभी इतनी सुबह चाय का कोई हिसाब नहीं था 🙂 मालिक बड़ा चिड़चिड़ा था बिना कुछ बोले बाहर चला गया पर उसका भतीजा बहुत शालीन था उसने बैठने को  कहाऔर चाय बनवाकर पिलवायी।
चाय पीकर बाहर पहाड़ी दृश्यों को निहारते उनको कैमरों और मोबाईल में उतार कर
समय बिताते हुए उसका इंतजार करते रहे। लगभग एक घंटे में वह वापिस आया। हमने उसे चाय पीने को कहा , वह बोला – “मैंने वहीं पीली थी ” और गाड़ी में सबको बिठाकर चोपता की और भागने लगा।


सूर्य का प्रकाश अभी पूरी तरह फैला नहीं था , पहाड़ों में ही घूम रहा था सो ऐसा उजाला रात को सोई प्रकृति को पूरी तरह से जगा नहीं पाया था। अलसायी सी वादियां मन को आगे बढ़ने से रोक रहीं थीं , हम उसे महसूस करना चाहते थे पर ड्राइवर को तो भागने  की पड़ी थी। कुछ आगे जाते ही सड़क के एक और पहाड़ी तो दूसरी ओर अत्यंत घने जंगल का सौंदर्य पराकाष्ठा पर था जो चोपता तक हमारे साथ रहा। एक घंटा कब बीत गया पता न चला , जब दूर जंगल -बुग्यालों में कैम्प और टैंट लगे दिखाई देने लगे तो पता चला की चोपता आ गया।


ड्राइवर ने गाड़ी रोकी तो देखा चारों और खाने-पीने की दुकाने हैं। हम सबने भी नाश्ता किया और घोड़े वाले तलाशने लगे। घोड़ेवाले हमारे पास स्वयं ही आ गए। यूँ तो तुंगनाथ पांच /छह किमी से ज्यादा दूर नहीं थे पर 3680 मीटर ऊंचाई की खड़ी चढ़ाई हमारे किसी के भी बस की बात नहीं थी सो सबके लिए घोड़े तय किए गए और चल पड़े। चारों ओर बुरांस और भोजपत्र के पेड़ और हरियाली मंत्रमुग्ध कर रही थी। आधे रास्ते पर जाकर घोड़े को आराम दिया गया और फिर चल पड़े और लगभग दो घंटे में मंदिर तक पहुंच गए।


मंदिर में कुछ भीड़ थी सो लाइन में लग कर भोलेनाथ की उपासना की और प्रकृतिके दृश्यों को आखों में भरा। इतनी जल्दी वहां से आने का मन तो नहीं था पर घोड़े वाले शोर मचा रहे थे सो लौटना पड़ा। लौटकर तो एक घंटे में ही वापिस आगए।

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