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एक धारा सी बहो!

जनवरी 26, 2008

नारी तुम तो आराध्य हो,

पर पुरुष कहता असाध्य हो!

यह कैसी विडंबना है?

पुरुष की कुरंगना है?

पर तुम तो संगठित रहो!

एक धारा के रुप में बहो।

यह क्या तुम तो परस्पर खिन्न हो?

अपने विचारों में ही भिन्न हो?

कभी दहेज की बलि देती हो!

कभी दहेज की बलि लेती हो!

कन्या होकर भी कन्या पर रोती हो!

कभी सास बनकर तड़पा ती हो!

कभी सास का शोषण कर जाती हो!

पहले स्वयं अँधकार दूर करो,

औरों से पहले अपनी बुराई चूर करो।

परस्पर सद्भावना बनाओ,

कन्या जन्म पर दुख न मनाओ,

पुत्रमोह को दूर भगाओ।

सच पूछो तो इतिहास भरा है,

पुत्र मोह ही दुख का कारण रहा।

कन्या तो विदूषी होती है,

पूरे समाज को ढोती है।

जन्म से पहले उसका गला तो न घोटो,

पुत्र के समान उसे भी हक़ दो तो?

समस्या स्वयं हल हो जाएगी,

कन्या पिछड़ न पाएगी।

दुष्टों से करने के लिए रक्षा,

उसे पूरी दिलाओ शिक्षा।

वह तो स्वयं शक्ति है,

अपनी रक्षा खुद कर सकती है।

अबला कहकर अपमान न हो!

सबला कहकर अधिमान न हो।

उसको अपना ज्ञान निखारना है!

समाज से बुराई का रुक्ष उखाड़ना है।

यह केवल वह कर सकती है,

बिना दहेज़ के बहु ले सकती है।

हर कन्या यह मान ले,

बिना दहेज़ के विवाह की ठान ले,

तो क्या सुधार नहीं होगा?

पुरुष भी उतार लेगा लोभ का चोगा।

समस्या सुलझती नज़र आएगी,

गुत्थी स्वयं सुलझ जाएगी।

स्त्री यथोचित स्थान पा जाएगी,

अपनी गरिमा पुनः बना जाएगी।

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