Posts Tagged ‘समाज’

महिला और समाज

मार्च 7, 2009


महिलाओं की सभी समस्याएँ एक दूसरे से जुड़ी हैं। उनकी जड़े एक ही जगह हैं। समाज और परिवार जब तक अपनी सोच नहीं बदलेंगे तबतक सभी कुछ ठीक होना कठिन ही रहेगा।
समाज की परवाह सही बात के लिए होनी चाहिए न कि कुरीतियों के लिए। स्त्री को सम्मान पहले स्त्रियों से ही मिलना चाहिए। स्त्रियों में हर रिश्ते में एकता हो तो पुरुष अपने आप सम्मान देने लगेगा।
मात्र जो दिखाई दे वही समस्या नहीं है जो उसका निवारण हो जाए। समस्या की जड़ों की मिट्टी तक जाकर ही आमूल-चूल परिवर्तन कर सकते हैं।
परिवर्तन घर से शुरु होकर समाज तक जाए। तब जागृति हो सकती है। यदि अपने बारे में सोचेंगे और दुनिया जाए भाड़ में तो कैसे परिवर्तन होगा? दुनिया की इकाई तो हम ही हैं। इतने लंबे समय तक बेरोकटोक जीवन जीने वाले हर रिश्ते के पुरुष को बचपन से ही समानता का भाव रखने की शिक्षा मिले तो कुछ समय बाद स्थिति बदलती नज़र आने लगेगी। जिन घरों में ऐसा माहौल बच्चे देखते हैं वे स्त्रियों को अपने समान समझते हैं।
यह माहौल स्त्री ही बना सकती है। इसके लिए बहुत ज़्यादा प्रचार और प्रसार की अवश्यकता होगी जो यह भी स्त्री को स्वयं ही करना होगा। ईच वन टीच वन के सिद्धांत पर चलकर यदि सभी स्त्रियाँ अपने आसपास की स्त्रियों के साथ-साथ बातचीत में ही उन्हें दिशा दिखाएँ तो परिवर्तन तेजी से होगा।
यह बात केवल सामजिक स्थिति के लिए या पुरुष से बराबरी के लिए नहीं है, बल्कि स्त्री की हर समस्या चाहे वह आर्थिक-निर्भरता हो या स्वास्थ्य संबंधी सभी के लिए समझ और विश्वास जगाने की ज़रुरत है।
अकसर देखा गया है कि स्त्री के भले की बात या तो स्त्री ही काट देती हैं या पुरुष अपने प्रति विद्रोह समझ लेते है। सच तो यह है जो पुरुष सही बात समझते हैं वह स्त्री कल्याण के काम में सहयोग करते हैं। पर कुछ जो शुरु से ही बेलगाम रहे हैं और परिवार में बचपन से ही अनुशासन और व्यवस्था नहीं देखें हैं वे अपने प्रति बग़ावत समझ बैठते हैं। और स्त्री के स्वतंत्र सोच को उसकी चरित्र-हीनता अविश्वास और संदेह की नज़र से देखते हैं। बड़े होकर यह सोच बड़ी मुश्किल से बदल पाती है कुछ की तो बदलती भी नहीं पर अगर बचपन से ही समानता दिखायी दे तो असमानता का व्यवहार करने की आदत ही न पड़े।
स्त्री अधिकार की बात पुरुष से विद्रोह नहीं है बल्कि स्त्री की गिरती स्थिति में सुधार के लिए है जब पुरुष अपना घमंड त्यागकर यह समझ लेगा तो वह स्वयं भी वही बात कहने लगेगा जो स्त्री कह रही है। पर अज्ञनाता मिटाने के लिए बहुत प्रकाश की आवश्यकता है। स्त्रियाँ जिनकी स्थिति ठीक है वे भी तो अंधेरे में ही तीर चलाते हुए उस स्त्री में ही दोष निकाल देती हैं जो परिस्थिति की मारी होती है या परिस्थितियों से विद्रोह करती है। सच ’जाके पैर न फटी बिवाई वो का जाने पीर पराई’। मैंने अकसर कामकाज के स्थान पर भी स्त्रियों को उस स्त्री के लिए जो परिवार में संघर्षरत होती को काम के लिए अधिकार से बोलने पर ताने मारते देखा है – अरे इसकी घर में तो बनती नहीं यहाँ क्या बनाकर रखेगी घर में भी यही अधिकार की बातें करती होगी इसीलिए पति से लड़ाई है या हमने तो इतना दहेज़ दिया है गा गाकर सुनाती हैं। दोहरी प्रताड़ना झेलती हैं ऐसी स्त्रियाँ जिनको घर और बाहर दोनों जगह अधिकार के लिए संघर्ष करना पड़ता है। यही कारण हैं कि वे अपने अधिकारों की बात करने से भी भागतीं है। इसलिए स्त्रियों को अपने प्रति और दूसरी स्त्रियों के प्रति पहले सजग होना होगा बाक़ी सब अपने आप सजग हो जाएँगे।

Advertisements