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सब नाटक है…

फ़रवरी 15, 2008

एक बार एक स्त्री जो किसी बड़े खानदान और वंश की थी अचानक आयी परेशानियों से अकेली रह गयी। उसका पूरा परिवार महामारी की भेंट चढ़ गया। घर में कुछ खाने को न रहा। अत्यधिक परेशान होने पर वह अपने रिश्तेदारों के यहाँ गयी , यह सोचकर कि शायद वे उसकी मदद कर दें। वह जहाँ भी गयी सभी ने उसे बड़े प्यार से बैठाया  और सत्कार किया पर जब भी वह अपनी परेशानी कहने की कोशिश करती तभी वे लोग उससे अपना ध्यान हटाकर अपनी कोई बात छेड़ देते। वह निराश होकर लौट आयी  और मजूरी करके अपना पेट भरने लगी। मजदूर स्त्रियों ने उससे बहनापा जोड़ लिया और सुख-दुख में उसका साथ देने लगीं।

एक दिन उनकी बस्ती में कोई बड़ा आदमी खाना बाँटने आया और ग़रीबों को कुछ उपहार भी दे गया। उसके जाने के बाद सारी बस्ती उस धनी का गुणगान करने लगी पर वह स्त्री गुमसुम हो गयी क्यों कि वह व्यक्ति उसका रिश्तेदार था। वह सोच रही थी कि क्या वह सचमुच दयालु है। लोग अपनी प्रशंसा के लिए/नाम कमाने के लिए दया का नाटक करते हैं। इस विषय  में पुरानी कहावत है-‘मूढ़ा-पीढ़ा सब कोई दे, पेट की व्यथा कोई न लेय।’  है न दया का नाटक!

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