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पुनर्प्रकाशन

जून 14, 2011

मई 10, 2006 को 19:04 पर प्रकाशित रचना का एकबार और प्रकाशन करने का मन हुआ; (क्योंकि) जब देखा कि पिछले महीने से इसे बार-बार सर्च करके पढ़ा जा रहा है तो ….

तू बटोही क्यों रुका है

आकाश तारों से खिला है,
चंद्रमा उसमें चला है,
तू बटोही क्यों रुका है ?
अपनी राह क्यों नहीं चला है ?
रुककर खड़ा ना रह पाएगा,
तूफ़ानों में घिर जाएगा।
आँधियां उड़ा देती हैं,
रुकने वाले को ज़बरन चला देती हैं।
राह भी भूल जाएगा,
इधर-उधर भटका रह जाएगा।
चारों ओर देख ले,
मन में अपने सोच ले,
क्या कभी कोई रुका है ?
बिना चले ही टिका है ?
मंज़िल पर पहुंचना तो है,
अभीष्ट को पाना भी है,
फिर क्यों सोचता है ?
अपनी राह छोड़ता है,
चल आगे आगे चल,
अपने आप मिट जाएगा छल,
चलते-चलते ना जाने कब
निकल आएगा दिन।

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