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आमजीवन के हीरे-१

जून 1, 2008

हमारे आसपास कुछ ऐसे लोग होते हैं जो देखने में अति साधारण होते हैं पर उनके अंदर अनेक कौशल और गुण भरे होते हैं। ऐसे ’आमजीवन के हीरे’ दिखाने की एक कोशिश है यह वर्ग कड़ी।

जब मेहनत और इच्छा दोनों साथ-साथ चलें तो अपार सफलताओं की संभावना रहती है। यह बात सिद्ध कर दी है बिहार के छोटे से गाँव ’अमहा’ जिला सुपौल से आयी पूजा पाठक ने ।
केंद्र सरकार के कर्मचारी राजेश पाठक की बेटी ने उन्हें अपने नाम की पहचान दिला दी है। आजकल उनका परिचय पूजा के पिता के रुप में हो रहा है।
जब दसवीं कक्षा का रिज़ल्ट आया तो उम्मीद के अनुसार पूजा ने ही ९२% अंक प्राप्त करके अपने संतएकनाथ सर्वोदय कन्या विद्यालय दि०गा०में सर्वोच्च स्थान प्राप्त किया। फिर क्या था सभी लोग उसका नाम जान गए।
प्राथमिक-शिक्षा अमहा में प्राप्त करने के बाद छ्ठवीं और सातवीं कक्षा पिपराबाज़ार ब्लॉक हैड्क्वार्टर के स्कूल में पढ़कर आठवीं में पूजा दिल्ली आगयी और पास के सरकारी स्कूल में दाखिला ले लिया।
सोच-समझ कर घुलने-मिलने वाली पूजा को शहर की तेज-तर्रार सहपाठिनों ने कई बार हूट करने की कोशिश की, परंतु अपने गुणों और व्यवहार से उसने सभी को अपने साथ कर लिया। यूँ हंसी उड़ाई जाने पर खिसियाकर रो जाने वाली पूजा अध्यापिकाओं की चहेती हमेशा रही। धीरे-धीरे वह विद्यालय की सबसे प्रखर छात्रा बन गयी।
मेहनत को सफलता की कुंजी मानने वाली पूजा मृदुभाषी और मिलनसार है। देखने में सीधी-सादी पर गुणों की खान है। मेंटल मेथ्स और विज्ञान की प्रतियोगिताओं में इनाम पाने वाली पूजा चुनौती स्वीकार करने में कभी भी हिचकिचाती नहीं है।
पूजा की माँ एक साधारण,समझदार और घरेलू महिला हैं; वह अपनी बेटी को पढ़ा लिखाकर अपने पैरों पर खड़ा करना चाहती हैं। पूजा के पिता उसे एक बड़ी डॉक्टर के रुप में देखना चाहते हैं, जबकि पूजा स्वयं कॉमर्स वर्ग से पढ़्कर एमबीए करना चहती है। सभी ने उसके पिता को  पूजा की रुचि के अनुसार ही पढ़ाने की सलाह दी है। देखिए पूजा क्या बनती है। हम उसके सफल भविष्य की कामना करते हैं।

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