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तन-मन धन से करें जो सेवा

अप्रैल 22, 2009

 

 

 

 

 

 

 

 

धरती से है दिन और रात,
फिर कैसी यह बात?
झेंप मिटाने की साजिश ,
या बाज़ार की है ख़ारिश?
पहले रौंदो, फिर रोदो!
तो अपनी क़ब्र खुद खोदो?
प्यार दिखाने से का होत है?
जब मन ही न पछतात?
दिवस मनाने से का फायदा?
जब दिल ही न हुलसात?
रात मना लो, दिवस मना लो,
चाहे रो लो, चाहे गा लो,
और कितना भी हल्ला मचालो,
जबतक न जागेगी मनसा,
न दोगे सब जीवों का हिस्सा,
मिट सकता है सबका क़िस्सा!
प्रणाम से पेट नहीं भरता है,
सेवा का भी फ़र्ज बनता है,
यह भी जननी सी बढ़कर है,
इसके साथ मरण भी तय है,
काहे यूँ ही इठलात हैं?
सबके सब बुकलात हैं,
आलस छोड़े, लालच छोड़ें,
अपना मान, सब हित जोड़ें,
वृक्ष बचाएं,नदी बचाएं और बचाएं पहाड़,
जो ऐसा नहीं सोचते, उनको दें पछाड़,
तनमन धन से करें जो सेवा,
वे ही फिर मानव तन लेवा।

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