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यूँ भी सोचा जाए

अप्रैल 16, 2014

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बीमार से मिलने कोई बीमार भी आए
हाल-ए-दिल जुबां से ना बताया जाए।

तीमारदारों से घिर गये हैं हम,
अब कोई और इतनी तक़ल्लुफ ना उठाए।

नश्तर सी चुभती हैं उनकी दलीलें
इससे तो अकेले ही दुख़ सहा जाए।

दुखती रग का तो उन्हें पता ही नहीं है
उनसे तो उनका मशविरा ले लिया जाए।

दौलत के नशे में पड़े सो रहे हैं वो
दर्दे-ए-ग़रीबी की चीख़ से उन्हें उठाया जाए।

नासाज़ तबियत को लाइलाज़ होने से पहले
हक़ीमों का तस्क़रा वक़ीलों से पढ़वाया जाए।

दवा की मियाद की तारीख़ देखना ज़रुरी है
दवा के नाम पर कहीं ज़हर ही ना खिलाया जाए।