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यह गुरु-पर्व नहीं, शिक्षक-दिवस है

सितम्बर 5, 2009

पाँच सितंबर हमारे देश में शिक्षक-दिवस के रुप में मनाया जाता है। डॉ० राधाकृष्णन के जन्म-दिन पर।
यह गुरु पर्व नहीं है। गुरु एक अलग ’टर्म’ है। शिक्षक आज एक एमप्लॉयी है। वह कर्मचारी है, रोजगारी है। तनख्वाह लेता है और दूसरे कर्मचारियों की तरह ही बोनस, डीए और इंक्रीमेंट पर खुश होता है। शिक्षण के साथ-साथ अन्य कार्य भी कर लेता है। चाहे वह एमप्लॉयर कराए या वह खुद करले 🙂
पर समय पर स्कूल जाता है और छुट्टी होते ही घर की ओर आ जाता है।
गुरु भारी शब्द है। जहाँ जिम्मेदारी भी भारी होती हैं। चरित्र-निर्माण की कला आती है। यदि न आती हो तो गुरु नहीं कहला सकता।
गुरु जीवन की कला सिखाता है न कि सिलबस पूरा कराता है। गुरु ज़रुरी नहीं कि शिक्षक के पद पर कार्य करता हो, ज्ञान-गुरु कोई भी हो सकता है। नीच-ऊँच लोगों की उपज है। वास्तव में तो वही ऊँचा है जो हमसे ज़्यादा जानता है। पर महिमा पद की है।
‘शिक्षक-दिवस’ पद का दिवस है। पद का मान है अपमान है। वरना तो शिक्षक के पीछे हाथ धोकर पड़ने वाले, शातिर-गुरुओं पर भी लाइट डालें। गुरु!  :-)( गुंडे) नज़र नहीं आते?
हैप्पी टीचर्स-डे
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शिक्षक बनने से पहले लाख बार सोचना चाहिए तब शिक्षक बनने की ठाननी चाहिए। क्योंकि
’यह तो घर है प्रेम का खाला घर घर नाय,
शीश उतारै, भू धरे जो बैठे इह माय। अपना आपा खोकर ही 🙂
 किसी को बनाया जा सकता है/गुरु बना जा सकता है। अन्यथा शिक्षक की नौकरी की जा सकती है।
यदि जीवन में नियंत्रण की कला न आती हो अपने व्यक्तित्व का विकास चहुमुखी न हुआ हो तो शिक्षक के नाम पर धब्बा बन जाते हैं।
शिक्षक-बनने की ट्रेनिंग भी गहरे गोते लगने जैसी होनी चाहिए न कि उथले पानी में बैठकर आजाने वाली। जब कोई काम मन से होता है तो उसमें जान डाल दी जाती है। पर जब खाना-पूरी होती है तो बात आज की बन जाती है।

वैसे तो…

तुम!
मोम हो तुम!
पिघलाकर मोमबत्ती बनानी है,
सोना हो तुम!
तपाकर कुंदन बनाना है,
सूत हो तुम!
बटकर रस्सी बनानी है,
लौहा हो तुम!
ठोककर औजार बनाना है,
गीली मिट्टी हो तुम!
ढ़ालकर मूर्ति बनाना है,
जल हो तुम!
जीवनदाता बनाना है।
बीज हो तुम!
रोपकर वृक्ष बनाना है,
अबोध हो तुम!
ज्ञान से विद्वान बनाना है,
शिष्य हो तुम!
शिक्षा से महान बनाना है।

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