हमारे तीर्थ- १

मई में उत्तराखंड के चारधामों की यात्रा पर गयी थी, तीन बार पहले भी जा चुकी हूँ|वर्णन पहले भी लिख चकी हूँ | प्रकृति का सौन्दर्य हमेशा ही आकर्षित करता है सो आगे भी हेल्थ ठीक रही तो जाती रहूंगी पर इस बार वहां की उन बातों पर लिखना चाहती हूँ जिन्हें हम  देखकर भी अनदेखा कर देते हैं|
यमनोत्री
सबसे पहले हम यमनोत्री गए| इस बार इतनी गर्मी थी की पूरे रस्ते लगा ही नहीं की हम पहाड़ों के बीच से निकल रहे हैं, यहाँ तक की गाडी के अंतिम पड़ाव जानकी चट्टी तक में पंखे चल रहे थे| बारिश की एक बूँद भी न पड़ी|
सुबह तैयार होकर यमनोत्री मंदिर के लिए प्रस्थान किया तो रास्ते में कुप्रबंधन का उत्कृष्ट उदहारण प्रस्तुत था- घोड़े/खच्चर वालों की मनमानी, पुलिस की अनदेखी और यात्रियों की चिल्लपों| घोड़े वाले मनमाने दाम मांग रहे थे| निर्धारित दाम में कोई नहीं जाना चाहता था | इतना ही नहीं इतना अंधाधुंध चला रहे थे की पैदल यात्रियों को चलना मुश्किल हो जाता था| दिल्ली से ज्यादा जाम तो वहां था चार घंटे घोड़े पर जाम में ही फसे रहे न आगे जा सकते और न पीछे| पुलिस वाले चायपानी की फ़िराक में लगे देखे गए| पूरे ट्रेकिंग में न तो कूड़ेदान थे और न ही पर्यावरण साफ़ रखने की हिदायतें लिखी थीं| यात्री भी अपने को ही सर्वोपरि समझते हुए पोलीथिन बैग, पानी की प्लास्टिक की बोतल और कूड़ा रास्ते में ही और पहाड़ों के ढलानों पर फ़ेंक कर मस्त थे|
मंदिर के पास तो गंदगी की बहुतायत थी| लोग यमुना में स्नान करके कपडे वहीँ फ़ेंक रहे थे| पूजा के साथ-साथ प्लास्टिक के कवर, डिब्बे, पाउच और न जाने क्या-क्या सब उसी में डाल रहे थे जिसे पापमोचिनी कहकर पूजा कर रहे थे| आदर और श्रृद्धा नहीं  थे तभी तो ऐसा कर रहे थे|
सरकार की ओर से कोई सख्ती नहीं थी यमुना सबकी, जिसे जो अच्छा लगे वही बहा दो| क्या कहानी है? हम क्यों नेत्रहीन, हृदयहीन होकर सिर्फ अपने बारे में सोचते हैं? अच्छे सुशिक्षित और उच्च पदासीन लोग भी वहां गंदगी फैला रहे थे| मंदिर में दर्शन करने के लिए वह VIP और गंदगी फैलाने में  सर्वोपरि …|
दुकानों में चढाने का सामान मिलता है जिसका काफी कुछ सामान यमुना में ही विसर्जित होता रहता है| भोजनालय और अन्य खाने पीने के स्थानों से भी नालियां यमुना में ही गिर रहीं थीं| जहां भी यमुना मुडती है वही यह सब जमावड़ा देखा जा सकता है| ऐसी अंधी श्रद्धा से तो सच्ची श्रद्धा रखकर दूसरों को पर्यावरण स्वच्छ रखने की प्रेरणा देना बड़ी पूजा है| हमारे प्राचीन ग्रंथों में प्रकृति की देखभाल को भी पूजा समझा गया है|
तीर्थ की गरिमा और महिमा समझकर वहां जाना चाहिए और गरिमामय व्यवहार करते हुए घुमक्कड़ी करनी चाहिए|

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