फिर से …

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आज बहुत दिनों क्या! महीनों बाद यहाँ लिख रही हूँ…
 
पिछला साल बहुत ही  जद्दोजहद का रहा| कभी ख़ुशी तो कभी रंज में डूबे दिन और हम …
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समय की निश्चित पसंद नहीं होती है, अपना एक चैनल सेट नहीं करता किशोरों की तरह जल्दी-जल्दी बदलता रहता है,  बापरे! कितनी वैरायटी पसंद करता है!!! रोज नयापन चाहता है शायद! 
यूं तो यह भी  पढ़ा है  कि  समय  को  मनाया जा सकता है योजना-बद्ध तरीके से, मेहनत और हिम्मत से पर कभी-कभी तो वह इतना अड़ियल होता की काबू में ही नहीं आता अपनी मनमानी करता है, उसके जाने भाड़ में जाए सबकुछ जो चाहे सो करलो| उसका यही रूप हमने देखा तो ऐसा लगा कि यही सर्वशक्तिमान है|
 विस्तार से फिर कभी…

 

 

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