धर्म

यह आलेख मैंने १२ अप्रैल २००६ को लिखा था आज फिर प्रकाशित कर रही हूँ।

धर्म का मेरे जीवन में महत्त्व

धर्म का मेरे जीवन में बहुत महत्त्व है। मैं समझती हूं यदि किसी के जीवन में धर्म नहीं है तो जीवन जीना असंभव सा ही है, पर मुझे नहीं लगता कि संसार में कोई भी जीव अधर्मी है।
धर्म शब्द का प्रयोग दो अर्थों में होता है- एक तो कर्त्तव्यों के लिए और दूसरा धर्मिता(आन्तरिक नैसर्गिक गुण) के लिए। इन्हीं दोनों विचारों की प्रगति और विकास के चरमोत्कर्ष की अवस्था में आज कहलाने वाले धर्म अस्तित्व में आए।
कर्त्तव्य ही धर्म है कर्त्तव्य पालन करना और कराना हमने प्रकृति से सीखा है।  प्रकृति स्वयं नियमों में बंधी है, नियम यानि अनुशासन। नियम भी पंचतत्त्वों के अनुसार भिन्न-भिन्न हैं।
धर्मिता भी नैसर्गिक है। जड़-चेतन दोनों में है जो सूक्ष्म अंतर का कारण है।
प्रकृति, जो स्वयं परिस्थितियों का परिणाम है, हमारी पहली गुरु है।उसने हमें जन्म दिया है उसी ने हमारी विचार-शक्ति को गहन बनाया है। विचारों का चर्मोत्कर्ष भावों को जन्म देता है, यही से शुरु होती है हमारी धर्मिक बहस।
किसी भी धर्म का उदभव एक समय या एक व्यक्ति या एक स्थान पर नहीं हुआ है। हजारों-हजार वर्षों तक अनुभवों की टुकड़ियों को मिलाकर धर्म वितान बने हैं। आवश्यकता आविष्कार की जननी है। व्यक्ति, समुदाय, समाज और राज्य सभी धर्म के बंधन में बंधे हैं। देश(स्थान), काल और परिस्थिति के अनुसार मांग पर विभिन्न धर्मों का अभ्युदय हुआ । जब धर्म प्रस्थापित हुए, तब उनको पूर्ण मान्यता थी क्योंकि उस समय वह माक़ूल थे, आज जैसे (स्वार्थवश मुड़े-तुड़े) नहीं। जैसे जैसे भौतिक संसाधन बढ़ते गये मानव मस्तिष्क सुखों की चाहना के इर्द-गिर्द घूमने लगा और नैतिकता (धर्म) से ध्यान हटाने लगा जिसके परिणामस्वरुप धर्म की आत्मा तो दब गयी है और बाहरी (कुरीतियां, आडम्बर, नाटकीयता और गुटबंदी) खोल ही दिखायी देने लगा है।

हरेक धर्म समाज के नैतिक पतन (परिस्थिति) के दौर में फलाफूला है। पतित विचारों के वातावरण में धर्म (नैतिक कर्त्तव्य) ही बुराइयां दूर करने में समर्थ होते हैं, परंतु इसका अर्थ यह नहीं कि सामान्य परिस्थितियों में नैतिक व्यवहार की आवश्यकता नहीं होती। यही नैतिकता का पाठ युगांतर से धर्म की गद्दी पर बैठा हुआ है और समय समय पर गद्दी संभालने वाले इसका दुरुपयोग भी करते रहे हैं। जीवन के हर बिंदु पर हमने जो बुराइयां बढ़ायीं है वही सब धर्म के परिप्रेक्ष्य में भी लागू होती हैं। यदि समाज में किसी भी बिंदु पर नकारात्मकता ना होती तो फिर धर्म का भी अस्तित्त्व ऎसा ना होता, जो एक असंभव सी बात है।
बात आज के दौर की करते हैं। आज भौतिक-विज्ञान का युग है। सर्वत्र पदार्थों और रसायनों को प्रधानता दी जा रही है। सारे सुख भौतिक रुप में ढू़ढे़ जा रहे हैं।भावनात्मक सुखों के लिए भी भौतिक साधनों की ओर ताकते हैं! यही विरोधाभास धर्म को प्रश्न बना देता है, जबकि उसमें संपूर्ण जीवन की समस्याओं के उत्तर छिपे हैं। ज़रुरत बस सूक्ष्मताओं को प्रकाशित करने की है।
इस प्रकार धर्म नियमों का पुलिंदा है जो हमें जीवन की यात्रा में आने वाली हर बीमारी से बचाता है और बीमार होने पर इलाज भी करता है। नियमों को व्यापकतम अर्थ में समझने पर धर्म का अर्थ पूर्णतः स्पष्ट हो जाता है।
मनुष्य का मस्तिष्क अत्याधिक विकसित है, वह अपनी स्पर्धा में स्वयं हार जाता है, अपने बनाए नियमों को ही ग़लत साबित करने की फिराक़ में रहता है , क्या करे प्रकृति ही ऎसी विकसित हुई है शक्ति को ही प्रमुख मानता है, सत्ता की लालसा में जीता है, फिर धर्म भी इसी सोच का शिकार हुए हैं।जब किसी भी धर्म का प्रादुर्भाव हुआ तो वह एक अनिवार्य रुप था परंतु परिवर्तन के अभाव मे( कारण चाहे अज्ञानता हो या स्वार्थ) उनका जीवन में महत्त्व ही संदेह के घेरे में घिर गया है, पालन की तो फिर बात ही दूर हो जाती है। धर्म बनाए भी मनुष्य ने हैं और विकृत भी वही करता आया है।
धर्म को पालन करने का तरीक़ा उस का क्रियारुप है। जिसमें रीति-रिवाज़ संस्कृति, कला, मोहकता, संवेदनाओं और मनोविज्ञान से जुड़े पक्ष है, जिनका महत्त्व तो कभी कम नहीं हो सकता हां अनुसंधान और विकास के अभाव में विकृति यहां भी बहुत है। समय और ज्ञानवृद्धि के साथ साथ बदलाव की आवश्यकता वहां भी है, जिसकी पूर्ति जन-जागरण से ही संभव है।
समग्र और अतिव्यापक दृष्टिकोण से देखें तो धर्म का महत्त्व लेशमात्र भी कम नहीं हुआ है, बल्कि और ज़्यादा ज़रुरी हो गया लगता है, हां धर्म को संकीर्णता और कठोरता से परे होना चाहिए। विभिन्नता में एकता के साथ सभी धर्मों में अनुसंधान होने चाहिए ताकि प्राचीन विचार संपदा का सदुपयोग हो नाकि स्वस्थ समाज अविश्वास करने लगे।
धर्म डरने या डराने के लिए नहीं बल्कि जीवन में सुख-शांति और त्याग-प्रेम अपनाने के लिए हैं बशर्ते विकार रुपी वायरस से निजात पा लिया जाए। इसप्रकार हर धर्म स्वीकारणीय और नितांत महत्त्वपूर्ण हैं। जनजागरण और अज्ञानता का समूल नाश धर्मों को नए रुप में पुनः स्थापित कर सकते हैं।
अंत में स्वरचित पंक्तियों के साथ धर्म का जीवन में आज भी पूरा महत्त्व समझती हूं।
धर्म की दीवार ना बने,
धर्म की तलवार ना चले,
ओ धर्म के ठेकेदारों!
धर्म का अधिकार ना रहे,
धर्म कर्त्तव्य ही रहे,
मानवता जिसका मंतव्य रहे।

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2 Responses to “धर्म”

  1. प्रेमलता पांडे Says:

    आभार रंजनाजी!

  2. रंजना Says:

    आपके एक एक शब्द जैसे मेरे ही ह्रदय के भाव हैं…

    अतिशय आनंद आ या पढ़कर…

    बहुत ही व्यवहारिक और सुन्दर ढंग से आपने व्याख्या प्रस्तुत की है…

    आभार आपका इस सुन्दर कल्याणकारी पोस्ट के लिए….

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