बच्चा, बचपन और व्यवहार (२)

बच्चा, बचपन और व्यवहार (२)

पहले लेख में कहा गया था कि परिवारों में हो रहे परिवर्तन बच्चे के व्यवहार को बदलने का एक कारण है।
चूंकि परिवार का ढ़ाचा ही बदल रहा है, जीवन-चर्या बदल रही है अधिकार बदल रहे हैं कर्त्तव्य बदल रहे हैं तो फिर उसमें रह रहे बच्चे का व्यवहार न बदले ऐसा तो हो नहीं सकता है।
हम अपनी ओर नहीं देखते हैं और देखते हैं तो बहुत ही सुखद भाव के साथ। सभी के जीवन में कितना परिवर्तन आगया है। पैसा कमाने की होड़ और पद-लोलुपता के अलावा हर काम में स्पर्धा की अंधी लड़ाई ने हमें कितना परिवर्तित कर दिया है।
जीवनस्तर का अर्थ भौतिक जगत की लग्ज़रीयस सामग्री हो गया है। हम छोटी गाड़ी होने पर भी बड़ी गाड़ी खरीदने को प्राथमिकता देते हैं चाहे हमारे रिश्तेदार के पास ज़रुरत का कोई सामान तक न हो। हम अपने बच्चे को हर सुविधा देना चाहते हैं चाहे भाई के बच्चे पर कुछ हो न हो। हम सर्वोच्च बनने की इच्छा से जीते हैं। ज्ञान के फैलाव में सोच संकुचित हो गयी है त्याग और सेवा भी निजी हो गए हैं। फिर बच्चा क्या सोच बनाएगा और व्यवहार करेगा?
यह तो है सामाजिक वातावरण और व्यवहार की बात।

तकनीक के प्रयोग ने मानव जीवन में बहुत तेजी से परिवर्तन किया है। जीवन जीने के ढंग बदल गए हैं। हमने खुशी-खुशी परिवर्तन को स्वीकार कर लिया है क्यों कि इससे हमें सुविधाएँ हुई हैं पर हम भूल जाते हैं कि जब हमारा जीवन इतना बदल गया है तो बच्चे का तो जन्म ही इन नितनयी आने वाली सुविधाओं में हुआ है। वह अपना जीवन बदला हुआ थोड़े ही महसूस कर रहा है वह तो इसी रुप को ही जानता है।
यह हमारी सोच है जो हम उसमें परिवर्तन देख रहे हैं। जबकि परिवर्तन हुआ है हमारे और उसके जीवन में न कि उसके जीवन में। हम तो तुलना कर रहे हैं!
हर बड़ा अपने से छोटे बच्चे को अपने से तेज मानता आ रहा है। पर आधुनिक समय में परिवर्तन बहुत तेजी से हुए हैं, विज्ञान और तकनीक का हर क्षेत्र में प्रवेश नवीनता की निरंतरता बना रहा है पर हम अपनी पुरानी सोच को तेजी के साथ निरंतरता से नहीं बदल पा रहे हैं इसलिए आज का बच्चा बहुत तेज और अलग व्यवहार करता सा लगता है।
हमें अपनी सोच बदलनी होगी अपने पुराने विचारों को नयापन देते हुए अपने अनुभव से नन्हों के साथ व्यवहार करना होगा और उनके व्यवहार को समझना होगा। हमें अपनी सोच को, अपने व्यवहार को नए-पुराने के बीच संतुलित करना होगा और बच्चे को समझना होगा, संवाद बढ़ाना होगा तभी बच्चा हमें और हम बच्चे के व्यवहार को सहन कर पाएंगे।
क्रमशः

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6 Responses to “बच्चा, बचपन और व्यवहार (२)”

  1. manhanvillage Says:

    आप की संवेदनशीलता के लिये आप को शुभकामनायें , बहुत उम्दा लेखनी है

  2. रंजना. Says:

    Poorntah sahmat hun aapki baton se….

  3. ताऊ रामपुरिया Says:

    पर आधुनिक समय में परिवर्तन बहुत तेजी से हुए हैं, विज्ञान और तकनीक का हर क्षेत्र में प्रवेश नवीनता की निरंतरता बना रहा है पर हम अपनी पुरानी सोच को तेजी के साथ निरंतरता से नहीं बदल पा रहे हैं इसलिए आज का बच्चा बहुत तेज और अलग व्यवहार करता सा लगता है।

    आपने बहुत ही उपयुक्त सुझाव दिया है. इसको हमे अपनाना ही पडेगा. आंखे बंद करने से हल नही निकलेगा. समय के साथ आये बदलाओं को दृष्टिगत रखते हुये ही नई सोच कायम करनी होगी. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

  4. M Verma Says:

    सही सलाह हमें अपनी सोच बदलनी ही होगी.
    सुन्दर आलेख

  5. nirmla.kapila Says:

    बहुत सही सलाह है धन्यवाद्

  6. परमजीत बाली Says:

    बढिया पोस्ट लिखी है।बधाई।

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