शरद पूर्णिमा और सेनापति

सेनापति
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”रीति को बताई रीति, नीति को बताई नीति,
प्रीति को बताई प्रीति, मति दे दी मति को।
शिष्ट भाव-दृष्टि द्वारा मान दे गए विशिष्ट,
काव्य में प्रविष्ट लेखनी की शिल्ष्ट गति को।
झर गए सुधा बिंदु, भर गए रस सिंधु,
कर गए कृति से उजागर प्रकृति को।
राम भक्ति दायक, अमर-स्वर गायक-
सकल कवि नायक प्रणाम सेनापति को॥”

-कविवर ब्रजेंद्र अवस्थी

अनूपशहर में रामलीला प्रतिपदा से शुरु होती है और शरद पूर्णिमा को रामराज्य के साथ समाप्त होती है। चौदस को वहाँ महान कवि सेनापति की याद में बहुत बड़े कविसम्मेलन का आयोजन किया जाता है।
उस मंच से हमे महान और सुप्रसिद्ध कवियों को सुनने और साक्षात दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त हो चुका है। राष्ट्रकवि स्व०सोहनलाल द्विवेदीजी के दर्शन भी उसी मंच पर हुए थे।

आज रात भी वहाँ कवि सम्मेलन हो रहा होगा। सोचा मैं यहाँ बैठे-बैठे ही महाकवि को याद कर लूं। सेनापति के कवित्त मन-मुग्ध कर देने वाले हैं। कवित्त मानो तालपर शब्द! गेयता न आती हो तो उनके पद पढ़ने से अपने आप आ जाती है।-
” अरुन अधर सकल बदन चंद,
मंगल दरस बुध बुद्धि कैं विसाल हैं।
सेनापति जासौ जुव जन सब जीवक हैं,
कवि अति मंद गति चलति रसाल हैं।
तम है चिकुर केतु काम की बिजय निधि,
जगत जगमगत जाके जोति जाल हैं।
अंबर लसति भुगवति सुख रासिन कौं,
मेरे जान बाल नवग्रहन को भाल है।”

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आज शरद-ऋतु की व्रत-पूर्णिमा है। चंद्रमा की कलाओं के अनुसार यदि चंद्रोदय के समय पूर्णमाशी होती है तो व्रत पहले दिन चौदस में ही हो जाता है। बचपन में दादी के कहने पर हम शरद-पूर्णिमा की चाँदनी में एक सौ आठ बार बिल्कुल बारीक सुई में धागा डाला करते थे। तब हवा साफ़ थी चाँदनी भी निर्मल थी और आँखों पर चश्मा नहीं था तो कुछ मुश्किल नहीं था पर आज तो मोती सुई में ही धागा डाल लें तो बहुत है।
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