अपनी पसंद


कई मित्र मिलकर घूमने गए। घर से निकलते ही एक ने कहा चलो नदी किनारे चलते हैं, दूसरे ने कहा नहीं बगिया में बैठते हैं, तीसरे ने कहा नहीं मॉल में चलते हैं। चौथा बोला नहीं किसी अन्य मित्र के घर चलते हैं। बस यूँ ही करते-करते बहुत देर होगयी तो कहीं नहीं गए और वापिस घर चले गए यह कहते हुए कि कल जल्दी निकलेंगे।

अगले दिन सारे मिलकर मॉल में घूमने गए। अनेक शॉरूम! पर खरीदना कुछ न था सो दूर से ही देखते आगे बढ़ते रहे। तभी एक पुस्तकों का अड्डा आया। पहला वाला तेजी से वहाँ घूस गया यह बिना सोचे कि बाकी कहाँ हैं। बाकी आगे बढ़ गए फिर एक कैसेट्स की जगह आयी तीसरा वहाँ व्यस्त हो गया। इस तरह जिसको जो पसंद था वह वहाँ चलता बना और अपनी चीजें खरीद ली। आखिर में सारे एक रेस्ट्राँ में जाकर बैठ गए और कॉफ़ी मंगा ली। चुस्कियों के बीच आपस में ही कहने लगे यह ठीक रहा। हमने तो अपनी पसंद की दुकान का कार्ड भी ले लिया है फिर भी आऊंगा। अपनी-अपनी भी चला ली और साथ भी रहे। आगे भी ऐसे ही कार्यक्रम बनाएँगे। जिसको जो पसंद है वह तो वहीं जाएगा। फिर जबरदस्ती काहे ले जाएँ?

8 Responses to “अपनी पसंद”

  1. रंजना. Says:

    वाह ……सही कहा….

  2. रवि कुमार, रावतभाटा Says:

    बेहतर….

  3. शिव कुमार मिश्र Says:

    बहुत ‘पसंद’ आई आपकी पोस्ट.:-)

  4. ताऊ रामपुरिया Says:

    बहुत ही सुंदर और प्रेरणादायक कहानी. शुभकामनाएं.

    रामराम.

  5. Arkjesh Says:

    सही बात है !

  6. समीर लाल Says:

    जबरदस्ती तो होना भी नहीं चाहिये!🙂

  7. jayantijain Says:

    Nice post , this is Anekantwad of jainism

  8. sharad kokas Says:

    अभी तो इस पसन्द के सारे सूत्र ब्लॉगवाणी से जुड़ रहे हैं ।

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