दुनिया दुरंगी…

घर के पीछे दुर्गा-पूजा पंडाल है जहाँ का शोर सोने नहीं दे रहा। बस विचारो और भावों का अंधड़ चल गया मन में। कभी घर और कभी बाहर भाग रहा है मन। क्या है दुनिया?

दुनिया दुरंगी…

कहीं ख़ैरखूबी कहीं हाय-हाय!!!

बचपन की बातें भाग रहीं हैं बेतरतीब।

शशी एकलौती बेटी थी अपने माता पिता की और तीन भाइयों की अकेली बहिन। अपने ननिहाल आयी थी शादी के बाद पहली बार। आयु होगी लगभग अट्ठारह या उन्नीस साल। पति बालकिशन साथ आए थे। हम बच्चे जीजा को देखकर फूले न समा रहे थे। जीजा ताश खेल रहे थे हमारे भाई के साथ। तभी उनके गाँव का एक आदमी आया और उनको साथ ले गया। हम कुछ समझ न पाए क्यों चले गए जीजाजी।

दस दिन भी न गुजरे थे कि हम स्कूल से आए तो देखा हमारी अम्माजी बहुत रो रही हैं। हम बच्चे घबरा गए। पूछा तो पता चला जीजाजी शहीद हो गए चीन से लड़ाई में। वो वारंट -ऑफ़िसर थे अपनी फ़ौज में।( शशी दीदी हमारी माँ की सहेली की भतीजी थी और बिल्कुल पास में ही घर था।) हम बच्चे भी रोने लगे। माँ हमारा इंतजार कर रही थी हमें दादी को सौंपकर उनके गाँव गयी तभी।

अगले दिन माँ और उनकी सहेली लौट आयीं। पता चला कि शव चीन के कब्जे में था एक या दो दिन बाद पहुँचेगा। माँ रो-रोकर दादी को क़िस्सा सुना रही थी मैं और मेरी बहिन बिल्कुल पास बैठे थे। माँ ने बताया कि बालकिशनजी के माता-पिता को दिखायी नहीं देता। उनको बेटे के ग़मी की खबर नहीं दी थी पर वे बारबार पूछ रहे थे कि बालकिशन कहाँ है? शशी माँ बनने वाली थी। माँ इतना रो रही थी कि दादी और हम दोनो बहनें भी फफक पड़े। मुझे लिखते में आज भी रोना आरहा है।

कई साल बाद शशी फिर अपने ननिहाल आयी। हम बड़े हो गए थे। सब समझने लगे थी। उनका बेटा बिल्कुल अपने पिता की नकल था। बहुत प्यारा। शशी दीदी ने बताया कि हमेशा पिता के बारे में पूछता। एक दिन खेलते-खेलते नानी से भी पूछ रहा था ’मेरे पापा कहाँ है? मैने तो देखे नहीं है। यह मम्मी बताती नहीं है।’ सब रोने लगे थी उसकी प्रश्न पर। उसे दूसरी ओर ले जाकर खेल में लगा दिया था।

बालकिशनजी के माता-पिता बेटे के ग़म में तिल-तिल कर समाप्त हो गए थे। एकमात्र संतान थी वह उनकी।

बालकिशन का बेटा भी बड़ा होकर फ़ौजी बन गया। माँ ने मना भी किया था पर लड़का माना नहीं। मानता भी कैसे दादा और पिता दोनों ने देश-सेवा की थी वो क्यों न करे?

आज मुझे शहीद सूरी की पत्नी के बारे में जानने पर यह घटना जीवंत हो आयी। मैंने जून में कश्मीर-यात्रा के दौरान वीरों को पहाड़ो पर बिल्कुल टंगी हुयी स्थिति में देश की रक्षा करते हुए देखा है। मैं तबभी रो गयी थी उन सपूतों को देखकर। ‘(सबसे बड़ी बात यह थी कि तेज बारिश के बीच पूरे रास्ते में हर सौ या कुछ कम दूरी पर हमारे जवान पूरी मुस्तैदी से चौकसी कर रहे थे। उन्हें देखकर मन उनके प्रति गहरे सम्मान से भर जाता। बस में बैठे बच्चे उन्हें हाथ हिलाकर अभिवादन करते तो उनके गंभीर चेहरे पर मोहक मुस्कान आ जाती। वे भी हाथ हिलाकर स्वागत करते। सच कहें तो हमें उन युवक सिपाहियों को देखकर कई बार अपनी आँखें बंद करनी पड़ी वरना साथ बैठे लोगों तक हमारे भाव भी छलक जाते। सच्चे सपूत हैं। उनकी कर्तव्य-निष्ठा बस क्या कहें? महसूस ही की जा सकती है। देखकर!उनके सामने हम अपने को कितना छोटा पा रहे थे। न उपर शेड, न कोई कुर्सी, न अन्य कोई साधन बस मुस्तैदी! हमें गर्व है अपने वीर जवानों पर। हमने सच्चे हृदय से उनके दीर्घ-जीवन की कामना की।)

ईश्वर हमारे वीरों को दीर्घायु रखे और शहीदों की आत्मा को शांति दे और उनके परिवारों को सहनशक्ति।

उनकी देश-भक्ति को नमन-नमन!

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4 Responses to “दुनिया दुरंगी…”

  1. ताऊ रामपुरिया Says:

    इष्ट मित्रों एवम कुटुंब जनों सहित आपको दशहरे की घणी रामराम.

  2. रवि कुमार, रावतभाटा Says:

    अच्छा संस्मरण…
    सोचने पर मजबूर किया कि आखिर हम कब तक आपस के फ़ालतू तनावों में अपने नौनिहालों को शहीद करते रहेंगे…

  3. ताऊ रामपुरिया Says:

    यह संस्मरण पढकर मन बरबस ही श्र्द्धानवत हो गया. बहुत शुभकामनाएं.

    रामराम.

  4. समीर लाल Says:

    आपका संस्मरण पढ़कर वीरों के ज़ज्बे और परिवारों को जानने का मौका लगा. बहुत आभार.

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