यह गुरु-पर्व नहीं, शिक्षक-दिवस है

पाँच सितंबर हमारे देश में शिक्षक-दिवस के रुप में मनाया जाता है। डॉ० राधाकृष्णन के जन्म-दिन पर।
यह गुरु पर्व नहीं है। गुरु एक अलग ’टर्म’ है। शिक्षक आज एक एमप्लॉयी है। वह कर्मचारी है, रोजगारी है। तनख्वाह लेता है और दूसरे कर्मचारियों की तरह ही बोनस, डीए और इंक्रीमेंट पर खुश होता है। शिक्षण के साथ-साथ अन्य कार्य भी कर लेता है। चाहे वह एमप्लॉयर कराए या वह खुद करले🙂
पर समय पर स्कूल जाता है और छुट्टी होते ही घर की ओर आ जाता है।
गुरु भारी शब्द है। जहाँ जिम्मेदारी भी भारी होती हैं। चरित्र-निर्माण की कला आती है। यदि न आती हो तो गुरु नहीं कहला सकता।
गुरु जीवन की कला सिखाता है न कि सिलबस पूरा कराता है। गुरु ज़रुरी नहीं कि शिक्षक के पद पर कार्य करता हो, ज्ञान-गुरु कोई भी हो सकता है। नीच-ऊँच लोगों की उपज है। वास्तव में तो वही ऊँचा है जो हमसे ज़्यादा जानता है। पर महिमा पद की है।
‘शिक्षक-दिवस’ पद का दिवस है। पद का मान है अपमान है। वरना तो शिक्षक के पीछे हाथ धोकर पड़ने वाले, शातिर-गुरुओं पर भी लाइट डालें। गुरु!  :-)( गुंडे) नज़र नहीं आते?
हैप्पी टीचर्स-डे
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शिक्षक बनने से पहले लाख बार सोचना चाहिए तब शिक्षक बनने की ठाननी चाहिए। क्योंकि
’यह तो घर है प्रेम का खाला घर घर नाय,
शीश उतारै, भू धरे जो बैठे इह माय। अपना आपा खोकर ही🙂
 किसी को बनाया जा सकता है/गुरु बना जा सकता है। अन्यथा शिक्षक की नौकरी की जा सकती है।
यदि जीवन में नियंत्रण की कला न आती हो अपने व्यक्तित्व का विकास चहुमुखी न हुआ हो तो शिक्षक के नाम पर धब्बा बन जाते हैं।
शिक्षक-बनने की ट्रेनिंग भी गहरे गोते लगने जैसी होनी चाहिए न कि उथले पानी में बैठकर आजाने वाली। जब कोई काम मन से होता है तो उसमें जान डाल दी जाती है। पर जब खाना-पूरी होती है तो बात आज की बन जाती है।

वैसे तो…

तुम!
मोम हो तुम!
पिघलाकर मोमबत्ती बनानी है,
सोना हो तुम!
तपाकर कुंदन बनाना है,
सूत हो तुम!
बटकर रस्सी बनानी है,
लौहा हो तुम!
ठोककर औजार बनाना है,
गीली मिट्टी हो तुम!
ढ़ालकर मूर्ति बनाना है,
जल हो तुम!
जीवनदाता बनाना है।
बीज हो तुम!
रोपकर वृक्ष बनाना है,
अबोध हो तुम!
ज्ञान से विद्वान बनाना है,
शिष्य हो तुम!
शिक्षा से महान बनाना है।

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9 Responses to “यह गुरु-पर्व नहीं, शिक्षक-दिवस है”

  1. Zakir Ali Rajnish Says:

    गुरू वास्तव में वह हस्ती है जो अपने विद्यार्थियों का भविष्य बनाती है, उसकी कोई तुलना नहीं, उसका कोई मुकाबला नहीं।
    -Zakir Ali ‘Rajnish’
    { Secretary-TSALIIM & SBAI }

  2. प्रेमलता पांडे Says:

    शेफ़ालीजी आपकी भावुकता समझ आ रही है। जब कोई अपना काम ईमानदारी से करता है तो उसे ऐसी बातों से ठेस पहुँचती है।
    कहावत है कि एक मछली सारे तालाब को गंदा कर देती है, जब किसी समुदाय या वर्ग में कोई नकारात्मक बात है तो उसे सब कहते ही हैं, पर जिनमें नहीं हैं वो स्वयंसिद्ध हैं, उन्हें स्पष्ट करने की आवश्यकता नहीं है। सच्चे-शिक्षक का काम बिल्कुल वृक्ष के समान है वह दूसरों को देता है पर दूसरे(मानव) उसे भी काट डालते हैं।
    बाज़ारवाद की दुनिया ने शिक्षण को व्यवसाय बना दिया है। व्यवसायिक दृष्टि में शिक्षक भी अन्य महकमों के कर्मचारियों की तरह ही है।
    हमारी सोच ही हमारी अभिव्यक्ति होती है।

  3. shefali pande Says:

    ,दरअसल बात ये है कि हम अपनी सारी असफलताओं का दोष शिक्षकों पर डाल देते हैं ,लोगों से बर्दाश्त नहीं होता है कि ये अच्छा खाए ,पहने और अच्छे तरह से अपना जीवन व्यतीत करे ,उन्हें समाज का अंग समझना ही नहीं चाहते हैं .
    shefalipande.blogspot.com
    masrarni-nama.blogspot.com

  4. ताऊ रामपुरिया Says:

    आपका इमेल एडरेस प्रमाणपत्र के भेजने के लिये चाहिये. हमारे कमेंट बाक्स में छोड दिजिये, माडरेशन लगा है, उसे सार्वजनिक नही किया जायेगा. शुभकामनाएं और बधाई.

    रामराम.

  5. loksangharsha Says:

    nice

  6. ताऊ राम्पुरिया Says:

    बहुत बहुत खरी खरी बात कही आपने. शुभकामनाएं.

    रामराम.

  7. रंजना. Says:

    बहुत बहुत बहुत लाजवाब कही आपने….एकदम अपने ही मन की बात लगी यह…

  8. संगीता पुरी Says:

    शिक्षक दिवस पर बहुत बढिया आलेख !!

  9. nirmla.kapila Says:

    वाह जी खूब खरी कही । सच है आज ना तो वो शिश्य रहे ना वो गुरू। आभार्

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