अत्याधुनिकता प्लास्टिक तो नहीं?

हमारे देखते-देखते धातुओं को आऊट ऑफ़ फ़ैशन कहलवाने वाली प्लास्टिक ने क्रांति मचा दी और लोग उसके प्रयोग और प्रशंसा में सबकुछ भूलकर प्लास्टिकमय ही हो गए। धातुएँ और मिट्टी अपेक्षित होकर देखती रहीं। उन्हें अपने तिरस्कार का तो दुख इतना नहीं था क्योंकि धातुओं ने सोचा वे महंगी हैं और मिट्टी तो हमेशा यह सोचकर चुप हो जाती कि चलो अंत समय तो मैं ही काम आऊँगी।
पर आज प्लास्टिक जीवन-नाशक प्रदूषणकारक बनकर चंगी घूम रही है और चिढ़ा रही है। कहाँ-कहाँ से उसे हटाया जाए। सभी जगह घुस बैठी है।
हम किसी भी नए अन्वेषण के इतने गुलाम बन जाते हैं कि भविष्य की याद ही नहीं आती। आने वालों के लिए जमीन-जायदाद और सारे वैभव छोड़ने वाले जीवन जीने की परिस्थितियों का वैभव उड़ाकर अपने को महान समझ लेते हैं। अब जब सिर से पानी गुजर गया, समृद्ध देश पृथ्वी को छोड़ने की सोचने लगे हैं तब आखिरी आस की तरह यह सोच रहे हैं कि शायद प्लास्टिक और पॉलीथीन जैसे प्रदूषणकारकों को त्यागें तो कैसे त्यागें। विकल्पों की बात चल रहे हैं। रुपबदलकर फिर पुरानी चीजें अपनानी होंगी।
इसी तरह कई रुपों में हमने अपने जीने के ढंग बदल दिए हैं। हम आधुनिकता को अपनाकर लेटेस्ट कहवाने में ही अपने को महान समझते हैं और यह सोचते भी नहीं कि इसके आफ़्टर-इफ़ेक्ट से क्या स्थिति होगी। अति हर चीज की बुरी होती है।
अत्याधुनिकता ने जीवन की नींव को प्रभावित किया है। अभी तो लोग शान समझ रहे हैं पर एक दिन एमजे की तरह असमय ही भागना पड़ सकता है। प्रकृति को चुनौती कुछ हद तक ठीक है पर अति जो रही है यह भयानक है।
आधुनिकता की गति कुछ कम रहे तो स्थिरता हो सकते हैं पर यह क्या इधर खोज उधर प्रचार और बाज़ार! पर अगर ऐसा ही रहा तो इतना निश्चित है कि या तो पृथ्वी छोड़नी होगी या वापिस पीछे आना होगा। जल्दीबाजी कहीं वापिसी लायक ही न छोड़े! इसलिए हर मानव को इसपर अवश्य सोचना चाहिए। (एक बार इस विषय में काफ़ी पहले भी लिखा था। )

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5 Responses to “अत्याधुनिकता प्लास्टिक तो नहीं?”

  1. Dr.Manoj Mishra Says:

    बहुत सुंदर ढंग से लिखी गयी चिंतनीय पोस्ट.

  2. Shiv Kumar Mishra Says:

    बहुत बढ़िया पोस्ट.

    हम शायद अपना दृष्टिकोण अपने जीवन तक ही रखने के कारण ही इस परिस्थिति पैदा करते रहे हैं. प्लास्टिक ने जिस तरह से पैठ बना ली है, वह बहुत ही सोचनीय है. अब नहीं चेते तो फिर शायद मौका न मिले.

  3. ताऊ रामपुरिया Says:

    मुझे तो ऐसा लगता है कि काफ़ी देर तो हो ही चुकी है. फ़िर भी प्रयास नही छोडे जाने चाहिये, लिहाजा अब जाग जाना चाहिये.

    रामराम.

  4. समीर लाल Says:

    निश्चित ही विचारणीय विषय है. आपने बिल्कुल सही कहा, कहीं बहुत देर न हो जाये-या हो ही चुकी है!

  5. mehek Says:

    bilkul sahi baat,hame ab bahut satark hona hoga,plastic ka upayog kum karna hoga,varna sach mein ek din ye avani chodni hogi.

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