साहित्य और ब्लॉग

ब्लॉग पर लिखी सामग्री साहित्य का प्रकार है या नहीं? यह प्रश्न ऐसा ही है जैसे ’(मानव का) बच्चा मनुष्य है या नहीं’ पूछा जाए। हम विचारों की अस्थिरता के कारण कहाँ हिचकोले ले रहे हैं जो यह प्रश्न निकल कर आ रहा है।
आज तो सबकुछ योजनाबद्ध तरीके से होता है, लेखन भी इससे अलग नहीं है। व्यवसायिकता ने सब रुप बदल दिए हैं।
अब तो अलग-अलग विषयों के लिए अलग-अलग साहित्य है। साहित्य की अलग-अलग विधाएँ हैं उनके भी और छोटे-छोटे विभाजन है। कब क्या नया लिखकर नयी विधा अन्वेषित हो जाएं, पता भी बाद में चलता है। पहले संवेदना प्रधान थीं अब धन प्रधान है।

यदि नामधारी व्यक्ति सपाट लिखे तो सरलता में महानता है और आम आदमी गहरे डूब भी जाए तो मज़ा नहीं आता है। यही है पुरानी रीति है। दबाब-गुट जो करा दे सो सही। वरना कालीदास विद्योतमा से न ब्याहे जाते और न कबीर साखियाँ गाते-गाते कपड़ा बुनते रहते। न जयशंकर प्रसाद और भारतेंदु जैसे महान साहित्यकार कर्ज में जीवन काटते न निराला गरीब कहलाते। महान साहित्यकारों ने कभी अपनी चाटुकारिता नहीं करायी। पर आजकल तो स्वार्थ उपाधियाँ दिलवा देता है।
जन की आवाज तो साहित्य है, पर लिखे महान व्यक्ति तब। अगर जन स्वयं लिखे तो मूंग-मसूर की दाल। यह पुरानी परंपरा है। कहते हैं इंद्र ऋषियों की तपस्या में स्वयं विघ्न डलवा देता था कहीं उसका राज-सिंहासन न हाथ से निकल जाए।

ब्लॉग पर हर रुप में लिखने वालों की सामग्री शीशे में रखी है कोई पर्दा नहीं है। प्रतिक्रिया हो न हो पढ़ने वाला अपने हिसाब से अनुमान तो लगा ही लेता है। सबकुछ पारदर्शी है। आलोचना-समालोचना भी व्यक्ति-व्यक्ति कर सकता है। पसंद भी अपनी-अपनी हो सकती है। इतनी स्पष्टता होने के कारण दांव-पेंच को मौका नहीं मिलता है। लाख गुटबाज़ी हो, कितने ईच-अदर हों पर लिखी सामग्री तो सब पढ़ते हैं और सबकुछ समझते हैं- यही है ब्लॉग की अलग पहचान जो साहित्यकारों को परेशान कर रही है। वे भीड़ का मसाला लिखना चाहते हैं पर कमजोर भीड़ के लिए नहीं अपने को भीड़ का प्रेमी दिखाने के लिए।

तकनीकी-ज्ञान भी साहित्यकारों को परेशान कर रहा है। जो बौखलाहट में बदल गया है।
’साहित्य’ की विशद व्याख्या हो सकती है। पर अग्रिम पंक्ति में बैठे स्वार्थी लोग पीछे की सुगबुगाहट को दबा देते हैं क्यों कि उन्हें सीट छोड़नी पड़ सकती है।
अभिव्यक्ति साहित्य है। शब्द के जन्म के समय जो परिस्थतियाँ होती है उनके अनुसार वह पुकारा जाता है पर समय बदलने के साथ ही उसका रुप और अर्थ सुविधानुसार बदल लिया जाता है यही है शब्द की प्रयोग-यात्रा। साहित्य की विषय विभिन्न्ता के कारण ही उसे सस्ता-साहित्य, बाजारु-साहित्य एवं भक्ति-साहित्य, बाल-साहित्य और युवा साहित्य जैसी अनेक श्रेणी में बाँट दिया। व्यापक-दृष्टिकोण के कारण आज कुछ भी अमान्य नहीं है। यहाँ भी एकलपना है। मेरा अच्छा दूसरे का बुरा हो सकता है। कुछ भी थोपा नहीं जाता! चाहे यह समाज की नींव तोड़ र्हा रहा है पर सोच को नए आयाम भी दे रहा है।
दुनिया के विचारों के आगे क्षेत्रीय-विचार जैसी बात है। वरना तो हर अभिव्यक्ति साहित्य है । पर हाँ इस विषय पर विमर्श से ज़्यादा विभिन्न विषयों पर लिखना आवश्यक है न कि ढोल पीटकर ब्लॉगलेखन को साहित्यलेखन के बराबर बताना। समय परिवर्तनशील है। विचार भी परिवर्तन शील हैं फिर अभिव्यक्ति…?

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10 Responses to “साहित्य और ब्लॉग”

  1. पं.डी.के.शर्मा "वत्स" Says:

    समयानुसार् तकनीक बदलने के साथ साथ अपने विचार अभिव्यक्ति की सहजता ने ही ब्लागिंग को जन्म दिया है. लिहाजा यह जरूर हुआ है कि साहित्य कला के स्थापित मानदण्ड के मुताबिक ब्लाग पर प्रकाशित हो रही रचनाओं मे एक तरह का अनुशासन बेशक न दिखाये दे परन्तु यह तो अपने आप में सच है कि तकनीक की विशिष्टता की वजह से ब्लाग पर प्रकाशित रचनायें लम्बे समय तक उपलब्ध रहेंगी. और अपनी प्रव्रत्ति में ये रचनायें भी साहित्य ही है, हां एक तरह की तात्कालिकता इनका जो गुण बनकर उभर रही है, उसमें अनुभव की सघनता कई बार अखर सकती है पर इतने भर से उसकी उपस्थिति से इंकार नहीं किया जा सकता.क्योंकि हर ब्लागर अपनी विशिष्टताओं के साथ तो दिखायी दे ही रहा है और उसकी रचनात्मकता का विकास भी उसके ब्लाग पर प्रकाशित हुई रचनाओं को देख कर लगाया जा सकता है।

    उ०= सहमत हूँ वत्सजी। धन्यवाद प्रतिक्रिया के लिए।

  2. रंजना. Says:

    आपके आलेख ने तो दिल खुश कर दिया…….इतना सटीक कसा हुआ तथा सार्थक है की इसमें अब एक भी शब्द जोड़ने या घटाने की गुंजाईश नहीं…….शब्दशः सहमत हूँ आपसे….

    बहुत बहुत आभार आपका इस सशक्त आलेख के लिए….

    ताऊ ने भी बड़ा ही सही कहा है…

    उ०= आभार रंजनाजी!

  3. Shiv Kumar Mishra Says:

    आपने बहुत ही बढ़िया लिखा है.

    ब्लॉग को साहित्य कहा जाय, यह बात शायद ब्लॉग-जगत से किसी ने नहीं कही होगी. या तो प्रश्न उठाने वाले मीडिया के लोग होंगे या फिर एक साहित्यकार ने दूसरे साहित्यकार से पूछा होगा. मैं ऐसा इसलिए कह रहा हूँ कि ब्लॉग पर लिखने वाले को पता है कि ब्लॉग पर लिखी जाने वाली हर पोस्ट को साहित्य करार नहीं दिया जा सकता. इस तरह के प्रश्न वही करेंगे जो ब्लॉग-जगत से दूर बैठे हों या फिर उन्हें ब्लागिंग के बारे में सबकुछ मालूम न हो.

    साहित्यकारों को ब्लॉग-लेखन से कोई असुविधा नहीं होनी चाहिए. किसी ने उनसे नहीं कहा है कि अगर वे ब्लॉग को साहित्य मान लेंगे तो ब्लॉग-जगत का भला हो जाएगा. उन्हें यह कहने की भी ज़रुरत नहीं कि ब्लॉग को साहित्य नहीं करार दिया जा सकता.

    ब्लॉग और साहित्य, दोनों एक साथ रह सकते हैं. तेल और पानी की तरह.

    उ०= धन्यवाद शिवकुमार मिश्रजी!
    ब्लॉग और साहित्य, दोनों एक साथ रह सकते हैं. तेल और पानी की तरह.’ टांटर की कलम ने कब होल्डर और होल्डर ने कब बॉल्पैन और कब टाइपराइटर कब प्रींटींग-प्रेस से शब्द-लेखन यात्रा यहाँ आगयी! इसलिए यह तेल पानी की तरह क्या बिल्कुल एकाकार रहेगें। भविष्य में साहित्य ब्लॉगिंग की तरह ही लिखा होगा। कागज होगा भी या नहीं।
    व्यापक-दृष्टिकोण के कारण आज कुछ भी अमान्य नहीं है।

  4. loksangharsha Says:

    good

    धन्यवाद!

  5. हिमांशु Says:

    मैं तो ताऊ जी की बात को ही आगे रखना चाहूँगा ।
    बात आपने एकदम सच्ची कही है इस प्रविष्टि मे । आभार ब।

    उ०= हिमांशुजी धन्यवाद।
    ताऊजी के विचार से मैं भी सहमत हूँ पर स्वस्थ-बहस बेमानी नहीं बल्कि ज्ञानागार होती है बशर्ते निष्पक्ष हो।

  6. रवि Says:

    “…यदि नामधारी व्यक्ति सपाट लिखे तो सरलता में महानता है और आम आदमी गहरे डूब भी जाए तो मज़ा नहीं आता है।…”

    यह तो ब्लॉगों में भी होगा? है कि नहीं?
    हुसैन काड़ी से लकीर भी खींच दे तो वो आर्ट हो जाता है. जबकि नौसिखुआ घोंट घोंट कर भी उम्दा आर्ट बनाए तो लोगों की निगाह में नहीं चढ़ता. ये तो जग की रीत है!

    ऊ०= रवि भाई! धन्यवाद विचार रखने के लिए।
    ’यह तो ब्लॉगों में भी होगा? है कि नहीं”बिल्कुल होगा पर सभी कुछ पढ़ने और देखने को तो मिलेगा लोगों को चौइस का मौका मिलेगा। पाठक प्रमुख होगा कोई दबाब-गुट नहीं।

  7. ताऊ रामपुरिया Says:

    मेरे विचार में साहित्य कोई अलग से परिभाषित वस्तु नही है. समयानुसार हर अभिव्यक्ति अपना स्थान बना लेती है. और शायद चंद्रकांता जैसे अनेकों उदाहरण मिल जायेंगे. मेरे समझ से जो सहज अभिव्यक्ति है वही साहित्य है.

    आज ब्लाग तकनीक की वजह से लेखन आसान होगया..पहले सिर्फ़ नामधारी लोग ही छपते थे तो उन पर साहित्यकार का ठप्पा लग गया..और किसी साधनहीन व्यक्ति को छपने का मौका ही नही मिलता था तो टेलेंट के बावजूद वो उपेक्षित ही रहा.

    आज जब सब अपनी मन की बात विभिन्न विषयों पर लिख रहे हैं तो यह हाय तौबा क्यों? मेरे हिसाब से तो यह बहस ही बेमानी है. जनता जिसे पसंद करेगी उसे पढेगी बाकी कचरा अपने आप बाहर हो जायेगा.

    रामराम

    उ०= आभार अमूल्य टिप्पणी देने के लिए। विचार अनुकरणीय हैं। पर जब बात उठ रही है तो बहस तो होगी ही और कोई भी स्वस्थ बहस बेमानी नहीं हो सकती। सबके अपने विचार हैं।
    पुनः धन्यवाद विचार प्रदान हेतु
    प्रेमलता

  8. ALBELA KHATRI Says:

    umda kaha aapne…………

    उ०= अलबेला खत्रीजी धन्यवाद!

  9. मनीष Says:

    वाह , बहुत सुंदरता से आपने अपने विचार रखे हैं। अच्छा लगा पढ़कर !

    उ०= मनीषजी विचार अच्छे लगे आभार!

  10. संगीता पुरी Says:

    इस मुद्दे पर बहस ही व्‍यर्थ है !

    उ०= संगीता जी टिप्पणी हेतु धन्यवाद।
    बहस में कोई बुराई नहीं है। किसी भी विषय पर बहस उस विषय विशेष पर सूक्ष्म-ज्ञान से अवगत कराती है। हाँ बहस स्वस्थ होनी चाहिए।

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