अमरनाथ-यात्रा ( गंदरबल, कंगन और बालटाल)

 

सिंधु नदी सुबह उठे तरोताज़ा होकर किनारे आए और बस-प्रबंधकजी से भविष्य पूछा। पता चला रास्ता खुल गया है। सभी नहाये/बिना-नहाये और खाए/बिना-खाए जल्दी-जल्दी अपनी सीट पर बैठ गए। सचमुच रास्ता खुल गया था। ’बम-बम भोले’ की गगनबेदी गूँज और गासिंधु के किनारेड़ियों का काफ़िला, हॉर्न की कर्कश ध्वनि सब गड्डमड्ड, जाने की खुशी ! क्या मिश्रण था!
सिंध के किनारे बस चलती रही। कुदरत खज़ाना लुटा रही थी। पर झोली इतनी छोटी थी!!! सरल-मना अलौकिक आनंद पा रहे थे। गंदरबल में बहुत हलचल नहीं थी। फोर्स मुस्तैद थी। सबसे अच्छा यह लगा कि हर उम्र की बाल-बालिकाएँ स्कूल जा रहे थे
स्कूली-वर्दी में। बच्चियों के सिर ढ़के हुए थे। स्कूल जाती बच्चियाँमैंने श्रीनगर में कुछ जगहों को छोड़कर पूरे कश्मीर में (जहाँ मैं गयी) कहीं भी स्त्रियों और लड़कियों को बिना सिर ढ़के नहीं देखा। हाँ बुरक़ा भी नहीं पहने थीं इक्का-दुक्का को छोड़कर।
पूरे इलाके में पुराने डिजाइन के मकान थे। कहीं-कहीं तो बाहर टूटा-फूटा और अंदर भव्य महल

कंगन

 भी देखने को मिला। ऐसे ही नज़ारे देखते-देखते हम कंगन पहुँच गए।

कंगन सिंध के किनारे बसा है। एक चाय-नाश्ते की दुकान पर बस रोकी गयी। लोग तृप्ति में जुट गए। सामने ही सिंध खिलखिला रही थी। तबतक हमें यह पता नहीं था कि यह कौन सी नदी है। हम जल्दी से चाय पीकर नदी के किनारे से सौंदर्य-पान करने जा ही रहे थे। तभी एक लगभग आठ साल के बच्चे ने हमारी बाजू छूकर अपना हाथ फैलाया। हमने प्रश्नात्मक नज़र दिखायी तो बोला- ’चार रुपए दे दो।’
हमने पूछा- ’चार रुपए? क्यों?
वह बोला – नोट-बुक खरीदनी है।
हमने कहा – झूठ बोलते हो?
बच्चा – अल्ला क़सम!
हम – अल्ला से डरते हो? झूठ मत बोलना।
बच्चा – नहीं सच कह रहा हूँ।
बच्चा गंदे कपड़ों में था। हमने उससे एक दो स्पेलिंग्स पूछी उसने सही बतायीं। हमने उसे कुछ रुपए दिए और कहा पढ़ने का सामान ही ख़रीदना वरना अल्ला बुरा मान जाएगा।
हम कुछ दृश्य कैमरे में लेकर वापिस बस में आकर बैठ गए। पर लोगों की क्षुधा-शांति प्रक्रिया अभी चल ही रही थी। हमें नदी का नाम जानने की उत्सुकता थी। नीचे अन्य स्थानीय छोटे बच्चे खेल रहे थे। हमने हाथ के इशारे से बुलाया, भागकर आगए। हमने कहा – इस नदी का नाम क्या है?
एक दो तो हंसने लगे। उनमें जो सबसे छोटा था वह बोला- बताऊँ? दरियाह! जैसे तुम नदी कहते हो वैसे हम क्श्मीरी-लोग दरीयाह कहते हैं। बच्चे का आत्मविश्वास!!!
थोड़ी देर में बस चल पड़ी। हम यह तो बताना भूल ही गए कि जिस दिन से ऊधमपुर से चले थे उसी दिन से मेघा हमारी राह बुहार रहा था। जब थक जाता तो रुक जाता, पर शीघ्र ही फिर बरसने लगता। सूर्य बार-बार अपनी उनमस्कार! महा हिमालय!पस्थिति दर्ज कराता पर ठंडी हवा और रुकते-बरसते घने बादल बार-बार उसे पछाड़ देते।
दोनों ओर बर्फ़ीली धवल पहाड़ियाँ स्वागत कर रही थीं। बस ने दिशा बदली नदी के दूसरी ओर होगयी। सोनमर्ग आगया और कब चला गया हमें पता न चला। हम हिमालय से साक्षात्कार में खो गए। तभी पता चला बालटाल आ गया है। जोजीला के चरणों में सिंधु-घाटी में यही तो है बस का आख़िरी स्टॉप। सब ’बम-बम भोले’, ’भोले शंकर की जय’ उच्चारने लगे। बाहर आँधीनुमा हवा और तेज बारिश मौसम का परिचय, प्रदर्शन करके दे रही थी। मौसम को देखकर हम थोड़ा डर गए। कैसे जाएँगे।?
लगभग चार-पाँच घंटे तक बारिश औबालटाल में टेंट र तेज हवा अपना रुप दिखाती रही। जाम और कीचड़ इस क़दर कि शोभा बरनी न जाए।
चारों ओर हिमालय की बर्फ़ से ढ़की चमकती चोटियाँ। स्थानीय लोग कह रहे थे कि चालीस साल में इतनी बर्फ़ इस समय पड़ी है। वरना कभी-कभी तो बालटाल में इस समय धूल भरी आँधी भी देखी जा सकती हैं।
जैसे-तैसे चार बजे के करीब हम-सब को टेंट मिले। वहाँ कश्मीरी लोग छोटे-छोटे टेंट लगाकर उसमें बिस्तर का इंतजाम करते हैं। भीड़ बहुत होने के कारण बड़ी हाय-तोबा थी। हमारा टेंट वाले का नाम क़्यूम था। कंगन का रहने वाला, मैट्रिक पास गुर्जर क़्यूम जितनी भोली सूरत का था उतना भोहव और बादलों का मुकाबलाला भी था। बारिश में भाग-भागकर सामान उठाकर लाया। सबको गर्म-गर्म कहवा पिलायी। गर्म पानी और दो सिगड़ियों का भी इंतजाम किया। थोड़ी देर बैठने के बाद खाने की याद आयी। दोपहर का भोजन तो हुआ ही नहीं था। सबको भूख लगी थी। पता चला वहाँ कोई होटल नहीं है। लंगर लगे हैं। अपनी श्रद्धा से दान दो न दो भोजन मुफ़्त है। टेंट से झाँककर देखा तो अँधेरे में भी पहाड़ अपनी चमक और विशालता से इतनी बर्फ़, बालटालबड़प्पन जता रहे थे। बादल उनको धोने की कोशिश में पूरी शक्ति झौंके हुए थे।
रेन-कोट निकाले गए और बाहर निकले तो भजन-कीर्तन की तेज ध्वनि जंगल और पहाड़ों के बीच बुलंदी पर थी। हम पास के लंगर में ही जल्दी से चिकनाई-रहित भोजन खाकर वापिस भाग आए। यूँ तो वहाँ हर प्रकार का खाना मिल रहा था। छोले-भटूरे, पूरी-कचौड़ी, पराठा, हलवा, राजमा-चावल, टिक्की-समोसे न जाने क्या-क्या! पर जिस को जो अच्छा लगे वो तो वही खाएगा न?
बाहर आकर हमने एक कश्मीरी से पानी की बंद बोतलें खरीदी और जमा देने वाली ठंड से बचने के लिए वापिस आकर रजाई में सिगड़ी लेकर बैठ गए। फिर क़्यूम आया और कहवा पिलाकर गुडनाइट कहता हुआ सिगड़ी वापिस ले गया और हम हिमालय की गोद में सो गए।

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3 Responses to “अमरनाथ-यात्रा ( गंदरबल, कंगन और बालटाल)”

  1. shantilal dundara Says:

    ..तस्वीरें यात्रा सुन्दर हैं.

  2. समीर लाल Says:

    रोचक यात्रा वृतांत..तस्वीरें बहुत सुन्दर हैं.

  3. ताऊ राम्पुरिया Says:

    बहुत सुंदर यात्रा विवरण. घर बैठे ही अमरनाथ यात्रा करवा दी आपने. धन्यवाद.

    रामराम.

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