अमरनाथ-यात्रा (श्रीनगर)

 बाहर पता चला गाड़ियाँ आगे नहीं जा रहीं हैं। हम थ्री-व्हीलर में बैठकर शंकराचार्य-मंदिर देखने चले गए। ऊँची चोटी पर बना शंकराचार्य-मंदिर अति प्रचीन मंदिर है। कहते हैं आदि शंकराचार्य ने यहाँ कुछ वर्षों तक तपस्या की थी और शिवलिंग स्थापित किया। उनकी तपस्या-स्थली भी इंगित थी। बाद में राजा हरिसिंह ने इसका जीर्णोद्धार कराया। शिलाओं से चिना मंदिर बहुत बड़ा नहीं है पर ऊँची-ऊँची सौ से अधिक सीढ़ियाँ चढ़कर जाने में नानी याद आ गयी। मंदिर में बृहत्ताकार शिवलिंग और पंचमूर्तियाँ थी। घंटों की ध्वनि गूँज रही थी। चारों ओर छोटा सा प्रागंण था जिससे पूरा श्रीनगर और डल नज़र आती थी। क्या अदभुत विहंगम दृश्य था। मंदिर में जाने से पहले बड़ी चौकसी थी। कैमरा और मोबाइल ले जाने की मनाही थी। बाहर गेट से भी फोटो लेने नहीं दिए जा रहे थे।
लगभग एक घंटे में हम वापिस आगए। दोपहर का समय था। हमने हाऊस-बोट में ठहरने का मन बनाया।

डलझील

 डल के किनारे पर ही हाऊस-बोट देने वाले खड़े था। बातचीत करकराके हम शिकारे में बैठकर हाऊसबोट पसंद करने निकले। आखिर में ’ग्रीन-व्यू” पसंद आगयी और हम वहाँ ठहर गए। हाऊसबोट झील में फ़व्वारेका मालिक ज़हूर जो पास की हाऊसबोट में सपरिवार रहता था ने हमें कहवा पिलायी।
शाम को हम शिकारे में बैठकर डल घूमने निकले। मानों सपनों की दुनिया में आ गए हों। झील के अंदर फ़व्वारे, तैरती बत्तख़ें और हंस और रंग-बिरंगे कमल। पंक्तिबद्ध हाऊसबोटें और तैरते शिकारों के बीच रोशनी का अंबार मानो कोई अलग दुनिया है। झील में बसे गाँव, गाँव में बने खेतों में उगती फसल और हस्त-शिल्प का बाज़ार। सब जल के ऊपर। हम हस्त्शिल्प की दुकानों में गए और कुछ शॉल-स्टॉल इत्यादि खरीदे। वापिस आकर तैरती रोशनी का मज़ा लिया। नेहरू-पार्क में खिलते फूलों ने सौंदर्य की पराकाष्ठा से परिचय करवाया। रात में शिकारे से उतर हम ने जैन-ढ़ाबे में खाना खाया और वापिस शिकारे से ही हाऊसबोट तक आए और तानकर सो गए।
अगले दिन भी यात्रा नहीं खुली थी। हम फिर घूमने निकल पड़े। आज निशात-बाग़ देखने गए। बहुत सुंदर छ्टा!
निशात बाग़
ग्लेडूला की क्यारियाँ, सजे वृक्ष और झरने! मोरपंखी की क़तारें और गुलाब की कई नस्लें! सब मनमोहक! ऊपर से मंद फुहारें पूरा समा बाँध रही थीं।
बारिश ने बचने के लिए हम बाहर आगे और हज़रतबल दरगाह की ओर बढ़ गए। घुसते ही कबूतरों के झुंड ने स्वागत किया। नमाज़ पढ़ी जा रही थी । हम पीछे बने बग़ीचे में घूमने लगे। जब नमाज़ पूरी हो गयी दरगाह हज़रतबलतो हम अंदर जाने के लिए बढ़े, पता चला मुख्य दरवाज़े से केवल पुरुष जाएँगे।, स्त्रियाँ पार्क साइड में बने दरवाज़े झाँक सकती हैं। हमने दरवाज़ों से फोटो लेकर संतोष कर लिया। अंदर से हज़रतबल दरगाहवहाँ कुछ स्त्रियाँ नमाज़ पढ़के चुकी थीं।
वहाँ से हम लालचौकबाज़ार और थोक की मारकेट गए। पर जल्दी ही वापिस भाग आए|
शाम-शाम होते होते हम मुग़लगार्डन देखने गए। मुगल गार्डनथोड़ी देर ही घूमे थे कि गहरी शाम हो गयी और गार्डन बंद होने का समय हो गया। हम बाहर आगए और बिल्कुल सामने बने बुलवर्ड मार्केट मे टहलने लगे। वहाँ पर कश्मीरी दस्तकारी की दुकान से घर की बहु-बेटियों के लिए कंगन खरीदे। रात में वापिस जाकर, यह सोचते हुए कि कल यात्रा खुलेगी या नहीं, सो गए।

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5 Responses to “अमरनाथ-यात्रा (श्रीनगर)”

  1. lubna Says:

    so nice websiti ti is .
    so nice picture

  2. shantilal dundara Says:

    आपने. बहुत आभार

  3. ताऊ राम्पुरिया Says:

    बहुत अच्छे से चित्रों द्वारा दर्शन करवाये आपने. बहुत आभार आपका.

    रामराम.

  4. समीर लाल Says:

    आभार…आगे और आगे इन्तजार लग जाता है हर बार!!

  5. Dr.Manoj Mishra Says:

    aaj fir bahut sundr report.

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