भगवान नहीं इंसान है वो

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माँ तो नहीं है उसकी यादें हर पल हैं। माँ,जननी, जन्मदात्री, जीवनदायिनी, माता, अम्मा, मम्मी और मम्मा! और अनेक शब्दों से माँ को पुकारते हैं। प्यार का उदाहरण माँ है कोई और रिश्ता नहीं हो सकता। वह न तो ऊँची-ऊँची बातें करती है और न गा-गाकर बताती है, न प्यार करने वाले को भगवान कहती है। वह तो बस निश्छल ममता रखती है। जन्म से ही नहीं इस ममत्त्व से भी माँ माँ है।
बच्चों को भी माँ को भगवान नहीं इंसान समझना चाहिए। माँ साकार है। इंसान है। हाड़-माँस से बनी है। उसे अपनी पूजा नहीं अपनी सेवा, आदर मान और देखभाल चाहिए।
फूलों की मालाओं और आरती उतारने से जीवन नहीं चलता है।
उसे प्यार का दिखावा नहीं चाहिए, उसे पैसे की भौतिक-संपन्नता से ज़्यादा भावात्मकता चाहिए। सब कुछ उपलब्ध हो पर बच्चों का फॉन न आए तो माँ उदास रहती है। बच्चे-बच्चियाँ यदि माँ से जुड़े रहते हैं तो माँ ग़रीबी में भी खुश रहती है।
मदर्स-डे को ही नहीं माँ को रोज़ाना याद रखना चाहिए।

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One Response to “भगवान नहीं इंसान है वो”

  1. vijay Says:

    सुन्दर अभिव्यक्ति है प्रेमलता जी
    – विजय

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