आम

हरा,लाल और पीला-पीला,
गोल-गोल और मोटा-मोटा।

खट्टा-खट्टा,मीठा-मीठा,
कोई बड़ा और कोई छोटा।

पक्का फल है, कच्चा भाजा,
तो ही तो है फलों का राजा।

 

होता कोई बोने वाला ,
और ही होता खाने वाला।

गर्मी आएँ, लूँ चल जाए,
आम से सब मिट जाएँ।

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4 Responses to “आम”

  1. जाकिर अली 'रजनीश' Says:

    आम की कविता पढ कर आम खाने का मजा मिल गया। शुक्रिया।

    ———–
    SBAI TSALIIM

  2. जाकिर अली 'रजनीश' Says:

    वॉव, आम की कविता पढकर तो मेरे मुंह में ही पानी आ गया।

    ———–
    SBAI TSALIIM

  3. Rahul Katyayan Says:

    आप लोगों से प्रेरणा लेकर हमने भी हिंदी मैं ब्लॉग लिखना शरू किया है. कृपया नीचे लिखे लिंक को क्लिक करें और अपने विचार बताएं…

    http://rahulkatyayan.wordpress.com/2009/05/04/जाग-मुसाफिर-भोर-भई/

    राहुल कात्यायन

  4. समीर लाल Says:

    आम महिमा पसंद आई और चित्र भी.

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