तन-मन धन से करें जो सेवा

 

 

 

 

 

 

 

 

धरती से है दिन और रात,
फिर कैसी यह बात?
झेंप मिटाने की साजिश ,
या बाज़ार की है ख़ारिश?
पहले रौंदो, फिर रोदो!
तो अपनी क़ब्र खुद खोदो?
प्यार दिखाने से का होत है?
जब मन ही न पछतात?
दिवस मनाने से का फायदा?
जब दिल ही न हुलसात?
रात मना लो, दिवस मना लो,
चाहे रो लो, चाहे गा लो,
और कितना भी हल्ला मचालो,
जबतक न जागेगी मनसा,
न दोगे सब जीवों का हिस्सा,
मिट सकता है सबका क़िस्सा!
प्रणाम से पेट नहीं भरता है,
सेवा का भी फ़र्ज बनता है,
यह भी जननी सी बढ़कर है,
इसके साथ मरण भी तय है,
काहे यूँ ही इठलात हैं?
सबके सब बुकलात हैं,
आलस छोड़े, लालच छोड़ें,
अपना मान, सब हित जोड़ें,
वृक्ष बचाएं,नदी बचाएं और बचाएं पहाड़,
जो ऐसा नहीं सोचते, उनको दें पछाड़,
तनमन धन से करें जो सेवा,
वे ही फिर मानव तन लेवा।

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7 Responses to “तन-मन धन से करें जो सेवा”

  1. saksham Says:

    awesome

  2. sanjiv salil Says:

    स्वच्छ हो पर्यावरण
    और भाषा शुद्ध हो.
    है ‘सलिल’ की कामना-
    हर मनुज प्रबुद्ध हो..

    उत्तर= आभार सलिलजी!

  3. महामंत्री तस्लीम Says:

    बहुत सुन्दर बात कही है आपने, जो तन मन धन से सवा करते हैं, वहीं फिर से मानव जन्म लेते हैं। मैं आपकी इस सोच को सलाम करता हूं।

    ———-
    TSALIIM.
    -SBAI-

    उत्तर= आभारी हूँ महामंत्री तस्लीम।

  4. प्रेमलता पांडे Says:

    टिप्पणी हेतु सभी को धन्यवाद!

  5. hempandey Says:

    आपकी ही पंक्तियों में दो और पंक्ति जोड़ कर प्रस्तुत कर रहा हूँ –

    रात मना लो, दिवस मना लो,
    चाहे रो लो, चाहे गा लो,
    चाहे ब्लॉग लिख लो
    चाहे टिपिया लो
    और कितना भी हल्ला मचालो,
    जबतक न जागेगी मनसा,
    न दोगे सब जीवों का हिस्सा,
    मिट सकता है सबका क़िस्सा!

  6. mehek Says:

    paryavaran ko bachana aaj sab se jaruri hai,hariyali hi man ka aaina ho,sunder rachana badhai

  7. परमजीत बाली Says:

    बहुत बढिया भाव ।अच्छी रचना है| बधाई|

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