पहली बार और अब!


जब स्वतंत्र भारत के पहले चुनाव हुए थे तो माँ-पिताजी बताते थे कि इतना उत्साह था मन में कि पता नहीं कैसे अभिव्यक्त करें।
हरी-लाल, नीली-पीली अनेक रंगों की झंडियाँ लगीं थी वोट डालने के केंद्र समारोह स्थल की तरह सजाए हुए थे। हर आदमी बिना कहे अपनी क्षमा के अनुसार काम कर रहा था और काम करके सकून महसूस कर रहा था।
पुरुष अपने मित्रों, गली-मोहल्ले के लोगों के झुंड के साथ बैंड बाजे बजवाते हुए नाचते गाते अत्यधिक खुश होते वोट डालने गए थे। मजाल क्या कोई वोट डालने से कतराने की सोचे भी।
स्त्रियाँ भी पीछे थोड़े ही थीं। अपनी-अपनी सहेलियों के साथ मिलकर ग्रुप बनाकर , नयी साड़ियाँ पहनकर घूंघट लगाकर लोक-गीतों की धुनों पर गाने गाती हुई वोट डालने गयीं, मानों कोई उत्सव में भाग लेने जा रही हो-”गयो-गयो रे फिरंगी तेरो राज जमानों आयो देसिन कौ।”
उस समय तो चुनाव सभी पना कम समझते थे। अगर कोई रह जाए तो मोहल्ले का लीडर बुलाने आजाता था।
अब तो लोग वोट डालने से भागते हैं और फिर सरकार को कोसते हैं। अजीब तब लगता है जब पढ़े-लिखे ऐसा करते हैं। कैसी अजीब बात है कि अधिकार-प्रयोग के लिए भी कहना पड़ता है।
यह देश हमारा सबका है। हम सब को अपने मताधिकार का प्रयोग अवश्य करना चाहिए।

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One Response to “पहली बार और अब!”

  1. mehek Says:

    bahut sahi kaha,vote karna chahiye,apna hak kyun chode.ek vote se bhi yaha sarkare badal jaati hai.

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