अलामात

जब टूटी सड़कें बनने लगें,
जब नेता परेशानी सुनने लगें,
जब हर दुकान और दफ़्तर में,
ज़ोर-ज़ोर से बहसें होने लगें,
तो समझो चुनाव समीप है।

जब छुटभैयों की बनने लगे,
झकाझक सफ़ेद दिखने लगें,
जब हर गली और मुहल्ले में,
उनकी मुस्कान बिखरने लगे,
तो समझो चुनाव समीप है।

जब नेता सुख-दुख में आने लगें,
अपनी संवेदनाएँ भी जताने लगें,
जब हर मंदिर और मदिरालय में,
भाषण और सभाएँ होने लगें,
तो समझो चुनाव समीप हैं।

जब दबे मुद्दों की बातें होने लगें,
ऊँचे-ऊँचे से वायदे होने लगें,
जब हर देसी-विदेसी मीडिया में,
नेता-नीति के इन्टरव्यू आने लगें,
तो समझो चुनाव समीप हैं।

जब नेता क़द्दावर लगने लगें,
राजनीतिक पार्टी सजने लगें,
जब पार्टी-नेता या नेता-पार्टी में,
यह समझ ही न आने लगे,
तो समझो चुनाव समीप हैं।

जब सरकारी-कर्मी हंसने-रोने लगें,
एलेक्शन ड्यूटी की बात होने लगें,
जब घर-बाहर सभी जगहों में,
मेरी-ड्यूटी,मेरी-ड्यूटी गाने लगें,
तो समझो चुनाव समीप हैं।</em
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2 Responses to “अलामात”

  1. Chandra Mohan Gupta Says:

    जब टूटी सड़कें बनने लगें,
    जब नेता परेशानी सुनने लगें,
    जब हर दुकान और दफ़्तर में,
    ज़ोर-ज़ोर से बहसें होने लगें,
    तो समझो चुनाव समीप है।

    ऐसा ही हो रहा है , और तो और ये सब समझ चुनाव आयोग को भी हो गई, तभी तो उसने चुनाव की तारीख भी घोषित कर डाली………………….बेचारा इतने सालों में इतना समझदार तो हो ही गया है………. हा..हा .. हा …..

    सुन्दर प्रस्तुति.

    चन्द्र मोहन गुप्त

    उत्तर- धन्यवाद चंद्रमोहनजी!

  2. mehek Says:

    जब नेता सुख-दुख में आने लगें,
    अपनी संवेदनाएँ भी जताने लगें,
    जब हर मंदिर और मदिरालय में,
    भाषण और सभाएँ होने लगें,
    तो समझो चुनाव समीप हैं।

    जब दबे मुद्दों की बातें होने
    ha ha waah maza aagaya,kya sahi baatein kahi aapne,magar ye sachai hai isko koi nahi badal sakta,jab ye sab hone lage samjhe chunav hai.dil khush kar diya shukran.

    उत्तर- शुक्रिया महक!

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