जीवन की पहेली


हमेशा कौन जिया है?
किसने अमरता का घूँट पिया है?
यह तो एक पहेली है,
जीवन की परम सहेली है।
नक्षत्र, तारे, जल-थल,
सभी तो बीते हैं!
पर निश्चित ही जीते हैं!
पर चाह मरती नहीं!
जीने से भरती नहीं!
कोशिश करलो लाख,
इच्छाओं को कर दो राख़,
फिर अंकुर फूट आएगा!
सुख-दुख के पत्ते फैलाएगा,
फूल खिलेंगे वासना के,
फल आएँगे राग-रसना के,
संसार फैल जाएगा,
चारों ओर लहराएगा।

शंकराचार्य-भवन, केदारनाथ

पर न होनी है तृप्ति,
न मिलेगी अनंत दीप्ति।
यदि चाहते हो मानना,
सच्चे जीवन का अर्थ जानना,
तो इच्छा ही मत करो,
जीवन-मौत खत्म करो,
आत्मा अमर होती है,
न उसकी मौत होती है।
मरती यह देह है,
जिससे अधिक नेह है,
पर यह तो आवरण है?
अंदर असली जागरण है।
इसका मोह छोड़ दो,
आत्मा की ओर मोड़ दो।
कभी न मौत आयेगी,
मरने से न डराएगी।
पहेली सुलझ जाएगी,
ज़िंदगी नज़र आयेगी


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