कुछ इधर-उधर की…

रहिमन देख बड़ौन को लघु न दीजिए डार,
जहाँ काम आवै सुई कहा करे तलवार।’ बचपन में पढ़ी यह कहावत कभी भूली नहीं। पर देखा जाता है कि छोटी से छोटी और बड़ी से बड़ी समस्या इन लघुओं के दरकिनार करने से ही बड़ौन के माफ़िक वृहत्ताकार हो जाती है।
बिना छोटे के बड़ा तो कोई हो ही नहीं सकता। फिर क्यों अहं? केवल स्वार्थ और दंभ के कारण। सभी महान हैं। कौन कमतर और कौन ज़्यादा। चींटीं से सबक़ तो लिया ही जा सक्ता है।
लेखन एक आदत हो सकती है, एक शौक हो सकता है, एक ज़रुरत हो सकती है। कुछ भी लिखा हुआ और कैसा भी लिखा हुआ कभी भी बेकार नहीं है। यह हमारी सोच पर निर्भर करता है कि हम उसमें से क्या उठाएँ। ज्ञान हर बात में छिपा होता है। नकारात्मक बातें अनुकरण के लिए नहीं बल्कि प्रतिकार करने के लिए होती हैं।
इसी विषय पर हमने कुछ लिखा था। पर माजरा कुछ और है।
बचपन में माँ इंद्र की कथा सुनातीं थीं कि वह देवताओं का राजा था, जब भी कोई ऋषि तपस्या करने लगता तो वह राक्षसों से सांठ-गांठ करके उनके तप में विघ्न डालता और तप भंग करा देता, क्योंकि उसे हर समय डर रहता कि कहीं कोई और राजा न बन जाए। आजतक यह चल रहा है। पद लोलुपता हमारी नीति हो जाती है।
आचार्य द्विवेदीजी ने स्पर्धा पर एक निबंध लिखा था लिसमे उन्होंने अँगरेज़ी के ’T’ के माध्यम से बताया था कि लोग अपने लिए इसे उल्टा करके प्रयोग करते हैं।
अच्छे-बुरे या साधारण-असाधारण की रेखा आवश्यकता अनुसार होती है। ग़रीब को रोटी की चिंता होती है तो अमीर को भोग की। इस पर एक कविता लिखी थी, कविता पर याद आया कि मसालेदार चीज़ इतनी ज़ायकेदार होती हि उसकी पौष्टिकता की परवाह! – जीभ का स्वाद ही सब कुछ है। पर कभी-कभी, हमेशा तो नहीं।
लेखन अभिव्यक्ति है। स्वतंत्र अभिव्यक्ति किसी खाँचे में नहीं ढ़लती, वह भावों का आवेग होती है जो शिल्प और कौशल के बिना बिल्कुल शुद्ध होती है। वह केवल अंतरमन खोलती है। पर जब उसमें शिल्प और कौशल की चाशनी होती है निश्चय ही वह मीठी अधिक हो जाती है, पर असलियत पगी हुई भी हो जाती है।

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3 Responses to “कुछ इधर-उधर की…”

  1. Anil Kant Says:

    बहुत अच्छा लिखा है आपने …काबिले तारीफ़

    मेरी कलम – मेरी अभिव्यक्ति

  2. Ashish Kumar Anshu Says:

    नकारात्मक बातें अनुकरण के लिए नहीं बल्कि प्रतिकार करने के लिए होती हैं।

    सच कहा

  3. anshu Mali Says:

    भावपूर्ण अभिव्यक्ति

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