और सब यहीं छूट गया

थोड़ी सी खाँसी उठी और हृदय-गति रुक गयी। संसार में शरीर पड़ा रहा, आत्मा निकल गयी। यही जीवन है।
एक कम साठ की निर्मल मन से दुखी थीं। चाहे कितनी ही हँसती रहतीं पर संतान न होने का दुख छिपा नहीं पाती थीं। संतान न होने का दुख ही नहीं बल्कि यों कहें कि उनके लिए संतान का सुख निर्धारित नहीं हुआ था। तभी तो पहले एक अनाथ लड़की गोद ली, पाली-पोशी, पढ़ायी करायी, नाज़-नखरे उठाए, पर यह क्या सोलह साल की होकर शरीर छोड़ गयी। निर्मल कई साल तक उसका नाम लेलेकर रोती रहीं। फिर अब एक लड़की बिना गोद लिए पालनी शुरु की थी। लड़की आठवीं पढ़ रही थी तो कल रात खुद अलविदा कर गयीं।
सारी धन दौलत ऎशो-आराम सब पड़ा है। पर नहीं तो निर्मलजी के शरीर में जान नहीं। मृत शरीर देखकर लगा कि अब आँख खोलेंगी और मुस्कराएँगी। पर कहाँ?
इतने असार संसार में लोग जब आपाधापी करते हैं तो ज़रा भी नहीं सोचते कि सब यहीं रह जाएगा। न कोई, न कुछ साथ जाएगा। मन विरक्त हो तो सब अपराध मिट जाएँ। मोह-माया की बेड़ियाँ कट जाएँ। किसी भी मृत शरीर को देखकर सबके मन में संसार की नश्वरता का भाव उमड़ता होगा। फिर यह तेरा-मेरी क्यों? सब कुछ तो छूट जाएगा। बड़े-बड़े राजा-महाराजा भी सब छोड़ गए तो आम आदमी का क्या?

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6 Responses to “और सब यहीं छूट गया”

  1. mahendra mishra Says:

    bahut sateek alekh. dhanyawad.

  2. प्रेमलता पांडे Says:

    धन्यवाद सभी को।
    रमाजी सुंदर पंक्तियाँ!

  3. ramadwivedi Says:

    डा. रमा द्विवेदी says:

    नाहक ही झगड़ा करते हम,कुछ भी अपना नहीं यहां,
    चन्द दिनों का अभिनय कर लें,क्या जाने कल कौन कहां?
    सांसों की लय कब टूटेगी यह जान न कोई पाया है?
    कितना खोया,कितना पाया?गणित नहीं लग पाया है॥

    Katu sach hai lekin duniyawale maanate nahee yahi jeevan ki vidhambanaa hai…..

  4. mehek Says:

    sahi yaha sab kuch nashwar hai,kyatera kyamera ,ujhe itana tujhe itana ,kyun jhagada karte log?ab milna mitti se hi hai aakhari mein.sundar post.

  5. paramjitbali Says:

    सच है।

  6. Ashok Madhup Says:

    यही जीवन है। यही नियति हैं सबकों यहां से जाना है, इसके बावजूद सब यहां इस तरह धन स्रंग्रह एंव अन्य सुविधांए जुटाने मे लगे हैं कि वे अमर है।

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