मैं बिधवा हो जाऊँ!

जनिया के पति की मृत्यु हुए कई साल हो गए। बेचारी जनिया का कोई धीर धरने वाला नहीं था। दो छोटे-छोटे बच्चे। कहाँ से खर्च आए। कभी घर से बाहर भी न निकली थी। अब कैसे गुजारा हो। बच्चे सूख-सूखकर काँटा हो रहे थे। खुद की आँते सूख गयीं। दाने-दाने को मोहताज़। काफ़ी दिनों तक पड़ौस से माँग-माँगकर खाती रही । धीरे-धीरे सबने बंद कर दिया देना।
एक दिन पास में रहने वाली फुल्लो उसके घर आयी। जनिया उसके सामने फूट-फूटकर रोने लगी| फुल्लो ने उसे घरों में बर्तन-सफाई का काम करने की सलाह दी। जनिया मान गयी। अपने काम वाले घरों में से दो घर उसने जनिया को दिला दिए।
काम करते-करते जनिया ने मालकिन का दिल जीत लिया। जनिया उससे पैसे उधार मांगती रहती तो पगार में से कटवा देती। एक दिन मालकिन के पति ने किसी छपे-लिखे फार्म पर उससे अँगूठा लगवाया और लेगए। मालकिन से पूछने पर उसने बतया कि विधवाओं को सरकार से कुछ सहायता मिल जाया करती है। यह उसके लिए आवेदन-पत्र है।
कुछ दिन बाद जनिया को सरकार की ओर से रुपयों की मासिक मदद मिलने लगी। जनिया के दिन फिर गए। जनिया बच्चों को पढ़ाने लगी और घरों में भी काम करती रही।
इधर फुल्लो का पति रोज शराब पीकर आता और पत्नी और बच्चों को मारता। पैसा छीन ले जाता। बच्चों को स्कूल से मिलने वाली आर्थिक सहायता को भी लपक लेता। बच्चे पढ़ाई के सामान से वंचित रह जाते। फुल्लो रातभर अपने पति की गाली-गलौंच, मारपीट और बर्बरता सहन करती सो नहीं पाती। जब उसका पति नशे से पस्त होकर बेसुध हो जाता तो उसकी आँख लग जाती जिससे सुबह को आँख खुलती नहीं थी। बेचारी जिन घरों में काम करती उनसे भी डाँट-फटकार खाती देर से पहुँचने पर। बच्चे सहमे रहते। स्कूल में पढ़ने नहीं जाते। पिता के आते ही थर-थर काँपने लगते कब नशे में धुत किस पर पिल जाए।
एक दिन फुल्लो की पगार रखी थी उसका पति आया और सारे पैसे निकाल ले गया। फुल्लो आवेश में आगयी और लड़ने लगी पति ने डंडा मारकर उसकी टाँग तोड़ दी। बच्चे डर से  काँपने लगे और  रो-रोकर सो गए। फुल्लो दर्द से तड़पती रही। पति शराब पीकर बेसुध खर्रांटे भरता औंधा पड़ गया।
सुबह तक उसकी टाँग बुरी तरह सूज गयी थी। वह हिल डुल भी नहीं पा रही थी। काम करने जाना तो दूर था। पति उठा और देखकर उसकी हालत मुँह बिचकाता हुआ बोला-”बहुत अच्छा हुआ। अब जा कैसे जाएगी काम करने। बड़ा रोब दिखा रही थी पैसे का।’
फुल्लो ने अपनी चार साल की बेटी को जगाया और अपनी मालकिन के घर उन्हें बुलाने भेजा। लड़की भागकर उनके घर पहुँची और सारी बात बतायी और माँ को देखने चलने के लिए कहा। बच्चे की बात सुनकर मालकिन उसके साथ चल पड़ी। बच्चे बड़ी क़ातर नज़र से देख रही थी, डर साफ़-साफ़ दिखायी दे रहा था।’ मालकिन ने कहा घबरा मत चल तो रही हूँ।’ बच्ची रुआंसी सी बोली- आँटी पापा क्यों हैं? न हों तो अच्छा है।’
फुल्लो के घर जाकर मालकिन ने उसको अस्पताल पहुँचाया और पुलिस में इत्तला दी। पुलिने उसके पति को गिरफ़्तार कर लिया। फुल्लो को प्लास्टर चढ़ गया। बिस्तर पर पड़ी फुल्लो ने जाती हुयी मालकिन का पल्लू पकड़ लिया और हूकरी देकर रोने लगी। मालकिन ने उसके सिर पर हाथ रखकर उसके ठीक हो जाने की दिलासा दी। फुल्लो रोते हुए बोली- ’मे’म साब भगवान से मेरे लिओं बिन्ती करीयों कि मैं बिधवा हो जाऊँ।’ ये मर जाए तो कम से कम सरकार सहायता तो करेगी जिससे बच्चों की परवरिश हो जाएगी। इसका का क्या यह तो जेल में भी मुफ़्त की रोटी तोड़ेगा।

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2 Responses to “मैं बिधवा हो जाऊँ!”

  1. ab inconvenienti Says:

    वैसे भी ऐसे थर्ड क्लास लोग हमारे आस पास भीड़ बढाये हुए हैं, ये मरें तो इनके बीवी बच्चे, और इनसे त्रस्त दूसरे लोग चैन की सांस लें. जनसँख्या में से कुछ दुष्ट भी कम हो जायेंगे. ऐसे ही लोगों को देखकर लगता है की बच्चे पैदा करने के कलिए भी लाइसेंस मिलना चाहिए. (सिर्फ़ उन्ही लोगों को जो बच्चों की ठीक से परवरिश करने के योग्य हों)

  2. mehek Says:

    kuch kehne ko shabdh hi nahi hai,bahuthi marmik chitran,magar bahut se auraton ka aaj bhi sach hai ye jeevan ka.

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