हम तो ऐसे ही रह गए!

चिराग़ के नीचे अंधेराज़िंदगी जीने का अंदाज़ सबका अलग-अलग होता है। सबके सुखों की परिभाषा भी अलग होती हैं। सैंतीस साल से अध्यापन से जुड़ी मै’म शा आजकल अक्सर उदास हो जाती हैं, जबकि संसार की नब्ज़ के अनुसार देखा जाए तो दुनिया की समस्त खुशियाँ उनके पास हैं। दो बेटे और बहुएँ उच्चपदासीन हैं जो उन्हें बहुत प्यार और सम्मान देते हैं। उन दोनों के दो-दो प्यारे-प्यारे बच्चे हैं। पति का सुखद सानिध्य है| स्वयं वह ममता से लबालब भरी हैं। अपना पूरा जीवन उन्होंने अध्यापन के साथ-साथ गृहस्थी में लगाया है। आज भी हर काम बड़ी खुशी और तन्मयता से करती हैं, परंतु कभी-कभी इतनी उदास हो जाती हैं कि उन्हें अपना बीता हुआ जीवन व्यर्थ गँवाया हुआ लगता है।
बच्चों के साथ अमरीका और यूरॉप घूम चुकी मै’म का मन अक्सर उदास हो जाता है। कहने लगती हैं -”सारे भौतिक सुख मिलने पर भी आत्मा का सुख नहीं मिला। प्रभु की भक्ति न हो पायी। हमेशा ही घर-गृहस्थी के टंटों में फँसी रही। अब तो जीवन थोड़ा रह गया है। अन्त समय पर मेरे पास तो सुकार्यों का कोई लेखा नहीं होगा। मैंने ऐसा कोई भी अलग से कर्म नहीं किया जो मेरे लिए संतुष्टीदायक हो?s गृहस्थी तो सभी पाल लेते हैं। मैंने कौन सा तीर मार लिया। यह धन दौलत किस काम की है इसका क्या फायदा? बच्चे स्वयं इतना कमा रहे हैं।”
एक पुरानी कहावत है-
’पूत सपूत तो क्यों धन संचय?
पूत कपूत तो क्यों धन संचय?’
मै’म को सभी ने सलाह दी है कि आपने अपनी गृहस्थी का बहुत अच्छे से पालन किया| आपको उसका फल भी अच्छा मिल गया है। अब समाज सेवा में लग जाओ। जो मन में आए वह दान करो- चाहे धन, चाहे मन और चाहे तन।
मन और धन की बात पर तो वह कुछ सकारात्मक रुख प्रकट करतीं हैं, पर तन ( मरणोपरांत शरीर के अंगों का दान) के दान की बात पर चुप हो जाती हैं।अगर इतने ज्ञानी जन भी तन-दान में सकुचाएँगे तो अनपढ़-अज्ञानी को कैसे मनाया जाए?
( मृत्योपरांत अंग दान देकर न जाने कितने जीवन की डोर पुनः सध सकती है )

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4 Responses to “हम तो ऐसे ही रह गए!”

  1. प्रेमलता पांडे Says:

    सहमतिपूर्ण टिप्पणी हेतु आप सब का धन्यवाद!

  2. mehek Says:

    shatprashit sehmat hai

  3. समीर लाल Says:

    बिल्कुल सही मुद्दा लिया है.

    अंग दान-महा दान!!

  4. ghughutibasuti Says:

    अच्छा लिखा है । आज ही अख़बार में पढ़ा कि गुजरात के लोग मरने पर अपने शरीर मेडिकल कॉलेजों को दान करते हैं और इतनी बड़ी संख्या में करते हैं कि मेडिकल कॉलेजों के पास ये जरूरत से अधिक इकट्ठा हो जाते हैं ।
    घुघूती बासूती

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