अपनी-अपनी राम-कहानी

रामदेई परेशान सोचती जा रही थी कि तभी बड़ी तेज़ी से एक बस उसके बिल्कुल पास आकर रुक गयी। रामदेई घबरायी हुई भौचक्की हो कर बस के गेट की ओर भागी और उसमें चढ़ गयी और सीट पर बैठ गयी। ड्राईवर जो उसे घूरे जा रहा था बोला-” तुझे मरना है तो कहीं और जाकर मर! मेरी गड्डी के नीचे क्यों आना चाहे मेरी दुश्मनी तो कोई ना” और गाड़ी स्टार्ट कर दी। सारे यात्री हंसने लगे। पर रामदेई खोयी हुई थी अपनी ही उधेड़-बुन में।
अब कहाँ जाऊँ? इतनी रात में कौन है मेरा? जिनके लिए मैंने अपनी पूरी ज़िंदगी लगा दी उनके तेवर तो देख लिए। उनको तो मेरी शक्ल तक देखनी मंजूर नहीं है। तनिक न सोचा कि रात में कहाँ जाएगी अकेली जान। यूँ दूध में मक्खी की तरह निकाल दिया?
मेरा क्या क़सूर है? मैं क्यों उन्हें बुरी लगती हूँ जो वो मुझे अपने पास नहीं रखना चाहते?ख़ैर कोई बात नहीं। मेरे कौन से सगे बेटे हैं जो मैं उनकी आस करूं?” रामदेई सोचती-सोचती बुदबुदा भी रही थी। यह सब सामने वाली सीट पर बैठी महिला भी देख रही थी।
रामदेई को पता नही था कि वह कहाँ पहुँच चुकी थी। जब बस रुकी तो वह भी झट से उतर गयी और चारों ओर देखने लगी। तभी पीछे से उसी महिला ने उसके कंधे पर हाथ रखा और बोली-”आपको कहाँ जाना है?” रामदेई की आँखें फट गयीं समझ नहीं पा रही थी कि क्या जबाब दे? उस महिला ने फिर पूछा। रामदेई की आँखे छलछला आयीं। बोली-
”कहाँ जाऊँ कोई अपना नहीं है।” स्त्री रामदेई की मनःस्थिति समझ गयी। बोली मेरे साथ चलो। रामदेई उसके साथ चल पड़ी। कुछ चलकर एक गली के मोड़पर आखिरी मकान का ताला खोलकर वह स्त्री उसे अंदर ले गयी। मकान बड़ा था। स्त्री ने उसे एक कुर्सी की ओर इशारा करके बैठने को कहा। रामदेई बैठ गयी। महिला उसके लिए पानी लायी फिर हाथ-मुँह धुलवाकर खाना खिलाया। उसके बाद उसे एक कमरे में लगे बिस्तर पर सोने भेज दिया।
सुबह उठी तो महिला पूजा-पाठ में लगी थी। उसके बाद उसने रामदेई को चाय-नाश्ता दिया। रामदेई रात को इतनी परेशान थी उसने उससे कुछ न पूछा। पर अब वह स्त्री रामदेई ने सब कुछ जानना चाहती थी।
रामदेई ने उसे सुनाया- मेरे माँ-बाप बचपन में ही गुज़र गए थे। ताऊ ने मेरी शादी एक दुहेजिया लड़के से कर दी जो पहले से ही दो बच्चों का पिता था। मैं निसहाय अपना घर पाकर इसी में खुश थी कि मेरा अपना है कोई। पर विधना को मंजूर न था दो साल बाद ही पति का दुर्घटना में देहांत हो गया। मैं जवान औरत और दो बच्चे। बड़ी मुश्किल से इज़्ज़त बचाते हुए पति के छोड़े धन से बच्चों की परवरिश करने लगी। बच्चों को पढ़ाया लिखाया। वे बड़े-बड़े पदों पर पहुँच गए। अपने को गला कर उनको बनाया। उनकी शादियाँ कर दी। अब उनको मैं बोझ लगती हूँ। मैं तो फाफानंद। हाथ में कोड़ी भी नहीं और बच्चे मुझे अपने साथ रखना नहीं चाहते। उनकी बहुओं को मैं गंवार लगती हूँ। क्या बताऊँ आज आँखें फाड़-फाड़ कर देखती हूँ तो कोई सहारा भी तो न दिखायी देता!” ऐसाकहकर रामदेई बिलख गयी। उस महिला ने उसे चुप कराया पर यह क्या? वह तो स्वयं उसके साथ रोने लगी। रामदेई ने उससे उसके बारे में पूछा तो वह बोली- सबकी अपनी राम कहानी है। औरत का जीवन ही पानी है। जहाँ चाहे पलट दो। मैं भी अपने पिता की अकेली संतान थी। पिता ने बड़े रईस परिवार में ब्याहा। पर पति को तो दूसरी स्त्रियाँ अच्छी लगती थीं सो घर छोड़कर किसी और के साथ रहते हैं। यह मेरे पिता का घर है। जिसमें पिछले पच्चीस साल से मैं अकेली रहती हूँ। मैं ने एक लड़की को गोद ले लिया और पालपोसकर उसको अपने पैरों पर खड़ा किया। जब उसकी शादी हो गयी तो वह कुछ दिन तो मेरे पास रही फिर कुछ दिनों बाद यह कहकर दूसरे घर में चली गयी – मेरी अपनी ज़िंदगी भी तो है। सारी उम्र आपके पास क्यों रहूँ। आप अपने घर में रहो और मैं अपने घर में।”
चलो आज से हम दोनों साथ रहेंगे कहकर वह स्त्री साड़ी के कोने से आँख के कोए को पोंछती रसोई की ओर मुड़ गयी।

( दी हुई स्थिति पर लिखी कहानी)

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2 Responses to “अपनी-अपनी राम-कहानी”

  1. समीर लाल ’उड़न तश्तरी वाले’ Says:

    क्या कहा जाये!!

  2. mehek Says:

    saman dukh ke saathi,ye bachhe kab samjehnge ke ek din wo bhi budhe honewale hai?

    exactly.

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