व्यर्थ की बातों से मुँह मोड़ लें

बचपन में ही मोना ने ज़िंदगी का फलसफ़ा समझ लिया था। पिता शराबी थे। उसने उन्हें कभी बिना नशे के नहीं देखा और न हीं उन्होंने कभी उससे प्यार से बात की। हमेशा डांट कर ही बोलते। मोना उनसे कतराती थी। माँ बहुत प्यार से बोलती थी। पर जब भी मोना माँ से किसी चीज़ या खिलौने दिलाने की कहती तो माँ पापा से पैसे मांगती और पापा झिड़ककर मना कर देते।
माँ सारे दिन घर का काम करती रात को पिता से मार खाती। दादी-बाबा भी माँ की कमियाँ निकालते और पिता तो बस पूरे ज़ल्लाद! आए दिन माँ को लात-घूंसे मारकर घर से धक्का दे देते जा निकल यहाँ से। मोना ज़ोर से रोती तो उसके भी चार-छः पड़ जाते। बेचारी माँ कुछ देर में लौट आती। जाए तो जाए कहाँ?
मोना माँ से कहती – ’आप आ क्यों जाती हो? चलो हम दोनों अलग रहेंगे। फिर पापा आपको कैसे पीटेंगे? मोना को देखकर माँ कहती पैसे कहाँ से आएँगे और कौन शरण देगा। सब भूखे-भेड़िए हैं।

‘तो माँ के पास न तो पैसे और न घर तभी उसे पापा से पिटना पड़ता है और पापा रोब जमाते हैं क्योंकि पैसे कमाकर जो लाते हैं।’ मोना ने सोचा।
मोना ने मन ही मन ठान लिया कि वह पढ़-लिख कर कुछ बनेगी ताकि अपना जीवन माँ की तरह आश्रित रहकर और पिटकर न गुज़ारे। उसने खुद कमाकर अपने पैसे बनाने की सोची ताकि न तो किसी के आगे हाथ फैलाना पड़े और अपनी मर्ज़ी से अपना पैसा खर्च कर सके।
वह जीजान से पढ़ी और पढ़कर एक बड़े दफ्तर में ऊँचे पद पर नौकरी करने लगी। उसके पिता जो बूढ़े हो चले थे उस पर आश्रित हो गए। उसने उनकी शराब छुड़ायी और ठीक से रहने के लिए प्रयत्न किए और सफलता हासिंल की।
माँ उसे देखकर बड़ी खुश होती थी उसने अपनी बेटी को अपनी राह खुद चुनने की इज़ाज़त दी। उसको पता था कि मोना एक सुलझी हुई युवती है।
मोना का आत्मविश्वास देखते ही बनता था। वह आग में तपकर निकले कुंदन के समान थी। उसमें घमंड बिलकुल भी न था। पर स्त्री शोषण को देखकर वह बौखला जाती थी। उसने स्त्रियों के लिए कुछ करने की ठानी। उसने देखा कि स्त्री अनपढ़ होने के कारण ज़्यादा शोषित होती है। न तो वह रुढ़ियों को तोड़ने की सोच पाती है और न समाज का सामना कर पाती है। इसलिए अपने घर के पास वाले स्कूल में शाम को गृहणियों को पढ़ाना और समझाना शुरु किया। वहा उनको शब्द-ज्ञान से लेकर दैनिक जीवन में प्रयोग होने वाले विज्ञान-संबंधी बातें भी बताती, कानून और स्व-रोज़गार का ज्ञान भी देती। स्त्रियाँ उससे प्रभावित होने लगीं और बदलाव झलकने लगे।
मोना ने अपने जीवन का ध्येय ही स्त्री की दशा सुधारना बना लिया। पर यह काम इतना आसान न था। उस पर अनेक लांछन लगाए जाते। उसे बुरा भला कहा जाता।जब वह पढ़ाकर निकलती तो स्त्रियाँ उसे सुना कर कहतीं-

’उफ़! इस लड़की के तेवर तो देखो, पता नहीं कौन सी पढ़ाई-लिखाई कर ली है। अरे उम्र निकल गयी तो पूरी ज़िंदगी घर में सड़ेगी। कौन पूछेगा फिर? ये निठल्ली औरतों की मंडली किसी काम न आएगी। बड़ी चली है दूसरों को सिखाने, कुछ अपनी भी तो सोच!
मोना ने कोई जबाब नहीं दिया और चुपचाप निकल गयी। क्या घर-परिवार बसाकर ही औरत का जीवन सफल होता है? माँ को क्या मिला? पूरा जीवन पिस-पिसकर निकाल दिया। मैं तो किसी ऐसे बंधन को स्वीकार न करुंगी जहाँ स्त्री सिर्फ गूंगी होकर जीए। क्या उसका अस्तित्त्व नहीं है? बोलती रहो मुझे तो बदलाव लाना है। क्यों विवाह को बंधन स्वीकरुँ? क्यों न स्त्री-पुरुष की सहभागिता समझाऊँ?? बंधन क्यों? स्त्री कोई क़ैदी है? या कोई सेविका? वह बराबरी से क्यों न रहे? अपने ही घर में आश्रित क्यों रहे? पर ऐसा तब ही हो पाएगा जब वह अपनी स्वयं की सोच को विस्तार देगी।
अपने जीवन को खुद बदलाव देगी। व्यर्थ की बातों से मुँह मोड़ लेगी। मुझे तो यही बदलाव देखना है।

( दी हुई स्थिति पर लिखी हुई कहानी)

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2 Responses to “व्यर्थ की बातों से मुँह मोड़ लें”

  1. समीर लाल ’उड़न तश्तरी वाले’ Says:

    प्रेरणास्पद कथा. उत्तम विचार.

    धन्यवाद समीर भाई!

  2. mehek Says:

    mona se hum itna hi kahenge ki,hum uske saath sehmat hai,padhlikhkar kisi ki gulam nahi bane,apne pairon par khadi ho,dusri nari ki maddat karien,magar jab unhe apne vicharon ee sehmat homewala jewan saathi mile,wo unka chunav jarur karein.

    धन्यवाद महक!

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