हरिहर बाबा

कोसी ने जो तबाही मचायी उससे जानमाल का जो नुकसान हुआ, जो परेशानी लोगों ने झेली उसकी भरपायी कभी भी नहीं हो सकेगी| जिनके घर का जो चला गया वह कभी वापिस नहीं आयेगा, जो बेघर हो गए उन्हें नया घर मिल भी जाए पर उस घर को वे कभी भी नहीं भूल सकते जो बाढ की चपेट में स्वाहा हो गया| लोग अपनी-अपनी तरह से सहायता भी कर रहे हैं और सरकारों और अफसरों को उनकी महानता पर कोस भी उतनी शक्ति से रहे हैं| मुझे इस पर सच्चा क़िस्सा याद आ रह है जो मेरी माँ सुनातीं थीं| यह् बात लगभग नब्बे साल पुरानी है|
बदायूँ गंगा के खादर में बसा है| इस जिले के कई गाँव हर साल बाढ की भेंट हो जाते थे| वहाँ एक संत हरिहर बाबा अपनी कुटिया बनाकर रहते थे जिन्होंने देखा कि अग़र गंगा पर किनारे-किनारे बाँध बना दिया जाए तो वह उफन कर गांवों में तबाही नहीं मचा पाएगी| अँगरेजों के राज में कौन इतना पैसा इन गाँवों के लिए लगाता| बाबा ने ठान ली कि बांध तो बनाएँगे| बस गाँव वालों को एकत्र करके अपनी इच्छा बतायी| गाँव वाले तैयार हो गए| सभी ने श्रम दान किया और जो उस रास्ते से निकलता उसी से पाँच तसला मिट्टी डलवायी जाती| मोटे लोगों के रथ और रब्बा निकलते तो उनसे मिट्टी के साथ-साथ एक अधन्ना भी लिया जाता और इसप्रकार बिना सरकारी सहायता के गंगा के किनारे-किनारे बाँध बनवा दिया और गंगा की तबाही से लोगों को और उनकी फसल को बचा लिया|
आज तो वहाँ कायापलट हो गयी है| पर हरिहर बाबा की कुटिया आज भी वहाँ है और हर साल हजारों श्रद्धालु वहाँ जाते हैं| पर बाबा को बाँध वाले बाबा और कुटिया को बाँधे पर हरिहर बाबा की कुटिया ही बोला जाता है|
उस समय स्त्रियों ने बाबा की महानता का गुणगान अपने लोक गीतों में भी किया- ‘गंगा पे बन्दा बनवाया हरिहर बाबा ने…’|

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