मुदा

मुदा नवीं में पढ़ती है। वो आज फिर प्रार्थना शुरु होने के बाद आयी और लेटकमर्स की लाइन में खड़ी हो गयी। वह कल भी लेट हो गयी थी। लेट्कमर्स को प्रवेश गेट के पास ही रोककर समझाया जाता है कि समय पर स्कूल आओ। उसके बाद ही उन्हें क्लास में भेजा जाता है।
मुदा चुपचाप खड़ी रही। जब अध्यापिका ने क्लास में जाने के लिए कहा तो चल पड़ी। क्लास में गयी तो कक्षा-अध्यापिका ने कहा – आज फिर लेट आयी हो। मुदा खिसिया गयी, उसकी आँखें भर आयीं। बोली कल से लेट नहीं आऊँगी, अगर देर होगयी तो छुट्टी ले लूंगी। टीचर ने उसे अपने पास बुलाया और धीरे से रोने का कारण पूछा। बच्ची नीचे देखने लगी। आँसू टपकने लगे। बोली- हमने अपनी झुग्गी में ही दुकान बना रखी है। रोजमर्रा का सामान माँ बेचती है।आजकल माँ बीमार है, भाई निकम्मा है, देर रात तक टीवी देखता है और सुबह को उठता नहीं है कोई काम नहीं करता है। माँ ने मुझसे कहा – ’तू दुकान खोल जा मैं बैठी-बैठी सामान बेचती रहूंगी। मे’म दुकान खोलने के कारण आजकल देर हो रही है। वैसे तो माँ खोल लेती है। मैंने सोचा थोड़ी डांट खाकर क्लास में चली जाऊँगी तो पढ़ाई तो कर ही लूंगी।’ (मुदा के पिता इस दुनिया में नहीं हैं।)
अध्यापिका ने उसे समझाया कि अगर यह बात वह पहले दिन ही बता देती तो उसे न तो लेटकमर्स की लाइन में खड़ा होना पड़ता और न हीं छुट्टी करने की सोचनी पड़ती। मुदा ने नाक ज़ोर से खींचकर आँसू रोकने की कोशिश करते हुए स्वीकृति में सिर हिलाया। धीरे से बोली अपने घर की बात बताने में शर्म आती है। अध्यापिका ने प्यार से सिर पर हाथ रखा और सीट पर बैठने का इशारा करते हुए कहा – टीचर आपकी अपनी है। उसे अपनी परेशानी बता देनी चाहिए। बच्ची गरदन हाँ में हिलाते हुए सीट की ओर मुड़ गयी।

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4 Responses to “मुदा”

  1. arun kumar yadav Says:

    Bastab mai teacher aisa hi hona chahiy.A KAHANIYA MESSAGE DETA HAI THANKS for this true ory

  2. प्रेमलता पांडे Says:

    आप दोनों का टिप्पणी करने के लिए धन्यवाद।
    तरुण! यह लघुकथा नहीं है, सच्ची कथा है।

  3. मनीष Says:

    Kash sare shikshak aisi Muda..on ki pareshani samajh unse aisa hi vyavhaar karte.

    Kathin paristhitiyon mein bhi shiksha ke prati abhiruchi rakhne wale bachchon ke liye man naman mein jhuk jata hai.

  4. Tarun Says:

    Achhi laghu katha.

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