नन्हे घोड़ेवाले

कल ही उत्तरांचल के चार धामों की यात्रा करके लौटी हूँ, प्रकृति की गोद ने माँ की गोद याद दिला दी। पर उसी के साथ-साथ कुछ ऐसा भी घटित होता रहा जो मन को झकझोर गया।
चढ़ाई वाले स्थानों पर घोड़े और खच्चर लोगों को गन्तव्य तक पहुँचाते हैं। पर घोड़े और खच्चर भी तो किसी के निर्देशन में चलते हैं। घोड़े के मालिक जो सेठ जैसी हैसियत रखते हैं घोड़े चलाने का लाइसेंस अपने नाम से अपना फोटो चिपका कर बनवालेते हैं पर असल में घोड़े चलाते हैं बाल मजदूर।
सरकार ने प्रबंध अपने हाथों में ले रखा है। लाईसेंस देखकर ही घोड़े वाले को यात्री सौंपती है, पर यह क्या नियम तो हर कोई तोड़ना जानता है। घोडेवाला कुछ दूर जाकर उसका संचालन भाड़े के सहीसों को देदेता है। यह सहीस बाल-मजदूर हैं जिनमें कई की आयु तो दस साल से ज़्यादा नहीं रही होगी। ये बच्चे अट्ठारह किमी की चढ़ाई के दो चक्कर लगाते हैं और बदले में मिलता है प्रति चक्कर सौ या सवा सौ रुपया।
न पैरों में जूते न तन पर ठीक से गर्म कपड़े न बारिस से बचने के लिए बरसाती। हाय रे जीवन!!!
जब उस घोड़े के मालिक से बात की तो वह बहाने लगाकर बच्चे को ही दोष देने लगा। पर बच्चा तो कुछ न बोला। पूरे रास्ते में चार बार फिसला । पाँच-छः घंटे की कठिन चढ़ाई में थोड़ा सा नाश्ता ही किया। बोला-’खाकर चला हू’। साढ़े बारसौ रुपए में से सरकार सिर्फ़ पचास रुपया टैक्स लेती है बाकी सब घोड़े वाला लेता है पर बच्चा…।
जरा से पेट के लिए इतनी बड़ी मजदूरी!
रास्ते में अनेक सुरक्षा -कर्मी मिले जो इन्हें देखकर मुंह घुमा लेते हैं, कोई इनकी ओर देखकर अपना समय नहीं गमाना चाहता। किसी को इनकी परवाह नहीं। बचपन कैसे खो रहा है!!!
१२ जून बाल-श्रम के विरोध का दिन माना गया है। बाल-श्रम बालक का तो जीवन बर्वाद करता ही है साथ ही श्रम करवाने वाले की मानसिकता, उसकी संवेदनशीलता और सहृदयता की कमी भी दर्शाता है। इतनी जागरुकता के बाद भी जब बालक कोल्हू के बैल के माफ़िक काम करता है तो मन रो जाता है। पर उनका मन कितना पक्का है जो इन बच्चों को इस तरह निचोड़ देते हैं। है कोई? जो इनकी परवाह करे!

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