जन्माष्टमी हाइकू

कन्हैया जन्मे
त्रिभुवन हरषे
पुष्प बरसे।

भादौं की रात,
कृष्णपक्ष अष्टमी,
रोहिणीचाल।

घिरा तिमिर,
बादलों की घुमड़,
चाप चमक।

कारावास में,
यशोदावसुदेव,
जन्मे अशेष।

सूप में डार,
वसुदेव बेहाल,
भागे जमुना।

जमुना हँसें,
उमड़ी हवै पड़ें,
चरण छुवैं।

छत्र से बने,
फनिया शेषनाग,
प्रार्थना करें।

हालबेहाल,
घबराये अपार,
पहुँचे द्वार।

कन्हैया दै के,
योगमाया लै लीनी,
भागे मथुरा।

कंस जगाए,
कारावास में आए,
कन्या थमाए।

हाथ ना आई,
भविष्यवाणी सुना,
कन्या मुस्कायी|

! मूर्ख सुन
अवतार भुवन!
निमष गिन!

देवकी जन्मे,
यशोदा के लाड़ले,
गोप बने हैं।

धेनु चराईं,
यमुना तट जाई,
वंशी बजायी।

दाऊ भइया,
तेरो पूत मइया,
कारो कन्हैया?

माखन चोरी,
गोपियों की ठिठोली,
लीला ये तोरी।

श्यामकिशोरी,
कुंजन में नहौरी,
यौं बरजोरी।

चाँदनी रात,
वृंदावन तड़ाग,
है महारास।

जाय मथुरा,
कंस लियो पछाड़,
प्रजा उद्धार।

कृष्णमुरारि,
चितचोर कन्हैया,
मुरली धारी।

राक्षस खींच,
जरासंध विदारे,
द्वारिकाधीश|

रुकमि रानी,
राजन बनमाली,
सोहें जू आली। 

One Response to “जन्माष्टमी हाइकू”

  1. ashutosh Says:

    प्रेमलता जी ,

    नश्वरता प्रकृति का नियम है, हमारे अस्तित्व का परम सत्य है , फिर भी, हम हमेशा अपने को भुलावे में रखते है । मैं भी इसी परिसीमा में हू । मॅन कि व्याधियों से ऊपर उठने का प्रयास जारी है । प्रोत्साहन के लिए ह्रदय से धन्यवाद ।

    – आशुतोष

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