गुरु कौन है?

आज गुरु-पूर्णिमा है, न जाने कितने शिष्य जिंहोंने अपने गुरु से मंत्र लिया हुआ है उनके प्रति अपनी श्रद्धा प्रकट करेंगे।  गुरुजी तो शिष्यों की श्रद्धा देखकर गदगद हो जाएँगे। शिष्यों की शिष्यता देखते ही बनेगी।

यदि बिना विकार के देखा जाए तो अपने से अधिक गुणवान और  मार्गदर्शक के प्रति श्रद्धा रखना बहुत अच्छी बात है, परंतु क्या सच्ची में ऐसा है? मेरे विचार से नहीं । अभी तक लोग केवल गुरु  की बातें करते आए हैं। गुरु  ढोंगी होता है शिष्यों को बहकाकर अपना बुकचा भरता है, अपने ऐशो-आराम के लिए बहुरुप रखता है,  यह  सच है, परंतु सिक्के का दूसरा पहलू भी है। कई  शिष्यों द्वारा भी  गुरु का  फ़ायदा उठाया जाता है। 

आज गुरु पूर्णिमा के पर्व पर गुरु और शिष्य दोनों को यह सोचना चाहिए। गुरु जो  सम्मोहन फैलाकर अबोधजनों को अपनी ओर खींच रहे हैं,  क्या सचमुच गुरु हैं? उनमें गुरुता  है? शिष्य जो   गुरु के नाम पर मज़े कर रहे हैं  क्या यही श्रद्धा है? नहीं।

न आज कोई गुरु है न शिष्य। सभी अपना-अपना स्वार्थ सिद्ध कर रहे हैं। सबसे बड़ा गुरु अपना मन है, अपनी आत्मा है, अपना विवेक है, जिसकी आज्ञा से हम चलते हैं। मन को नियँत्रित किए बिना आत्मज्ञान नहीं हो सकता और आत्म-ज्ञान के बिना विवेक जागृत नहीं होता। हमारा विवेक हमें कभी ग़लत कार्य करने की सलाह नहीं देता। विवेक से चलने के लिए  मनोबल बढ़ाना आवश्यक है। इसके लिए बाहरी थपेड़ों से अप्रभावित रहने का अभ्यास करना पड़ता है, जो अत्यंत कठिन है। चारों ओर फैले भौतिक सुख जो  इंद्रियों को तृप्त करते हैं मन को पीछे धकेलते रहते हैं। इतना पीछे कर देते हैं कि इंद्रिय-सुख ही मन का सुख लगने लगता है।  पर असल में मन का सुख ही असली सुख होता है। विवेक   एक सुंदर नियँत्रक हैं। हमें हमेशा ग़लत कार्य करने से रोकता  हैं। गुरु भी तो यही करता है तो फिर शरीर के अंदर छिपे गुरु को  पहचानना और उसकी बात मानना ही  सर्वश्रेष्ठ  है।

जब आत्म गुरु मर जाता है या कुपोषित हो  जाता है तो हम बाहर की  ओर भागते हैं।   जहाँ तक गृहण करने की बात है तो उसके लिए ज़रुरी नहीं कि एक ही व्यक्ति सिखा सकता है। मन तो हमारा है उसे स्वयं ही समझना होगा, रही बात संसार की तो सजीव और निर्जीव,  त्याज्य और स्वीकार्य  सभी  से कुछ न कुछ सीखा जा सकता है। अनुभव  मार्गदर्शन का कार्य भी करता  है, पर मन मारकर तो किसी भी गुरु से कुछ नहीं सीखा जा सकता। आज मन को जागृत करके  उसी को बलवान बनाने की महती आवश्यकता है। कमज़ोर मन ही भ‍टकता फिरता है।

2 Responses to “गुरु कौन है?”

  1. संगीता पुरी Says:

    चिंतन तो आपने अच्‍छा किया है .. पर मन गुरू नहीं हो सकता .. वह तो भटकाता है हमें .. वह तो अंतरात्‍मा है .. जो हमें अक्‍सर सही और गलत का अहसास कराती रहती है .. पर कभी कभी हम मन की बात मानकर आत्‍मा के कहने को नजरअंदाज कर देते हैं .. और बाद में इसी का बुरा फल हमें चुकाना पडता है।

  2. Sanjeeva Tiwari Says:

    बधाई !
    “आरंभ” संजीव तिवारी का चिट्ठा

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