हमारी हिंदी

दिन फिर गए!  यूँ तो हिंदी का बहाव किसी भी रुकावट से  रुका नही है। हमेशा वेगमय ही रहा है। संस्कृत से निकलते हुए पालि, प्राकृत, अपभ्रंश के आगे ब्रज और  अवधि जैसी धाराओं को समाहित करते हुए भव्य सलिला की तरह प्रवाहमान  ही रहा है। पर हाँ आम आदमी की बोलचाल और  साहित्य से आगे  जाकर रोजी-रोटी के साधन के रुप में वह वेग नही पकड़ा गया  जो पकड़ना चाहिए था। आज फिर आशा बंधी है। भूमंडलीकरण ने हिंदी के दिन फेर दिए हैं। 

प्रथम तो आज बड़े-बड़े देशों को अपनी दुकाने हमारे देश में  खोलनी पड़ रही हैं क्योंकि हमारा देश उन्हें मंडी लगाने की सही जगह लग रहा है। अरे लगे भी क्यों न? जहाँ  बसावट  होती है वहीं तो  वीकली मार्केट लगता  है।   अब संवाद के लिए हिंदी  ही तो माध्यम हो सकता है।

द्वितीय जब हिंदी भाषी लोग   दूसरे देशों में कार्य करने जाएँगे तो संवाद के लिए उनकी भाषा की अनदेखी नहीं की जा सकती। इससे हिंदी को विश्वस्तर पर बढ़ावा मिल रहा है। 

 कोई बात नहीं चाहे  कारण कोई भी हो हिंदी  का व्यापकत्त्व सुखद  अनुभूति कराता है।

स्वतंत्रता के बाद साहित्यिक गतिविधियों में जो मशीनीकरण हुआ है उससे हिंदी के प्रवाह की दिशा बदली है। हिंदी आम बोलचाल की भाषा के अलावा  ग़रीब आदमी की भाषा बनकर रह गयी। रोजी-रोटी का ज़रिया ढ़ूढ़ने में सहायक न होने के कारण विस्तार-  संकुचन करने लगी। पर  अब ऐसा लग रहा है कि ज़ल्दी यह उस दिशा में तेजी  पकड़ लेगी जहाँ से इसके  फैलने की स्वच्छंद स्थिति मिलेगी।

अन्तर्जाल पर हिंदी की  प्रसिद्धि और प्रचलन विश्वव्यापार के उदारीकरण के  कारण ही है। आम भारतीय  की सेवाएँ चाहे लेनी हो या उन्हें सेवाएँ देनी हो, रास्ता हिंदी की गली से होकर ही जाता है फिर गली से गुज़रना तो लाज़िमी है। यही समय है जब हिंदी  आमदनी के साथ-साथ उच्च-शिक्षा का माध्यम  भी बन सकती है।  अपना वह क्षेत्र जैसे तकनीकी, वैज्ञानिक और  चिकित्सा-संबंधी भी  बुहार सकती है जो वर्षों से उपेक्षित पड़ा है।  हम अपनी मातृभाषा के सर्वोन्मुखी विस्तार  की   आशा कर रहे हैं जब हिंदी में  पढ़कर हर क्षेत्र में अलख जगाएँगे।

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