राजभाषा हिंदी

हमारे देश की राजभाषा और राष्ट्रभाषा हिंदी है। इस विषय में कुछ महान हस्तियों के विचार और कथन भी महत्त्वपूर्ण हैं-       

” अगर हमारे देश का स्वराज्य अँगरेजी बोलने वाले भारतीयों का और उन्हीं का होने वाला है, तो निःसंदेह अँगरेजी ही राजभाषा  होगी, लेकिन अगर हमारे देश के करोड़ों भूखे मरने वालों, करोड़ों निरक्षर बहनों और दलितजनों का है और इन सबके लिए होने वाला है, तो हमारे देश में हिंदी ही एकमात्र राजभाषा हो सकती है।”               

                                                              – महात्मागाँधी  

” यदि भारतीय लोककला, संस्कृति और राजनीति में एक रहना चाहते हैं तो इसका माध्यम हिंदी हो सकता है।”                 

                                – चक्रवर्ती राजगोपालाचारी

 “राष्ट्रीय एकता का सर्वश्रेष्ठ माध्यम हिंदी है।”                    

                                     – डॉक्टर ज़ाकिरहुसैन  

भारत का हित चाहने वाले और उसकी एकता और अखंडता को बनाए रखने वाले   लोग ये समझते रहे हैं कि   विभिन्नता के बावजूद भी भारत की राजभाषा हिंदी ही हो सकती है।  यह सिर्फ़ भावुकता से कही गयी बात नहीं है, बल्कि ठोस आधार पर कही गयी बात है। प्राचीन काल में संपर्क भाषा संस्कृत थी तो मध्यकाल में फ़ारसी का प्रयोग हुआ। अँगरेजों ने आकर अँगरेजी को फैलाया, परंतु हिंदी कभी भी मरी नहीं, बल्कि अपनी व्यापकता का परिचय देती हुई सभी से मिलकर चलती रही। यही कारण है वह राजभाषा के पद पर आसीन हुई। 

 देश की आजादी के समय संविधान-निर्माताओं ने  1947 में विभिन्न प्रांतों में बोली जाने वाली 14 भाषाओं को चुना। 1967 में इक्कीसवें संशोधन द्वारा ‘सिंधी’भाषा को जोडे़ जाने पर  पंद्रह हो गयीं।1992 में इकत्तरहवें संशोधन के द्वारा इसमें कोंकणी, नेपाली और मणिपुरी को भी सम्मिलित कर लिया गया है। इसप्रकार संविधान के अनुसार  आज  निम्नलिखित 18 भाषाएँ शासकीय पत्राचार के लिए चुनी हुयी हैं- 1. असमिया, 2. बंगला, 3. गुजराती, 4. हिंदी, 5. कन्नड़, 6. कश्मीरी,7. कोंकणी, 8. मलयालम, 9. मणिपुरी, 10. मराठी, 11. नेपाली, 12. उड़िया, 13. पंजाबी, 14. संस्कृत, 15. सिंधी, 16. संस्कृत, 17. तेलगू, 18. उर्दू।

ये संविधान की आठवीं अनुसूची में हैं, ये भाषाएँ देश के 91% लोगों के द्वारा प्रयोग की जाती हैं, इनमें हिंदीभाषी 46%  हैं इसलिए हिंदी को राजभाषा के रुप में मान्यता मिली।

संविधान के अनुच्छेद 343 के  अनुसार संघ की भाषा हिंदी और लिपि  देवनागरी होगी।  संघ के शासकीय कामों में अंकों का रुप अन्तर्राष्ट्रीय होगा।अनुच्छेद 343 में यह भी है कि हिंदी भारत की राजभाषा होगी, लेकिन संविधान लागू होने की तिथि से आगे पंद्रह वर्षों की अवधि तक संघ के समस्त राजकीय प्रयजनों के लिए अँगरेजी भाषा अतिरिक्त भाषा के रुप में प्रयोग की जाती रहेगी। साथ-साथ संसद को अधिकार दिया गया था कि यदि आवश्यक  समझे तो अँगरेजी के प्रयोग को आगे   तक के लिए बढ़ा सकती है। यही कारण है कि अभी तक अँगरेजी साथ-साथ चल रही है। 

हिंदी एक पूर्ण विकसित भाषा है और अनेक पड़ावों से गुज़रकर इस रुप में पहुँची है जो इसकी विशालता और व्यापकता के साथ-साथ  गतिशीलता का भी परिचय  है।

आज से बहुत पहले दीनबंधु सी.एफ. एंड्रयूज़ ने कहा था ” मेरी समझ में हिंदी एक ऐसी आधुनिक भाषा बन गयी है, जिसमें नये शब्दों की ख़पत आसानी से हो सकतीहै और नये विचारों को बड़ी सरल भाषा में व्यक्त किया जा सकता है। इसप्रकार आधुनिक हिंदी के  लिए भारत की राष्ट्रभाषा होना बड़ा आसान हो गया है।”

हमें अपनी मातृभाषा की समृद्धि  के लिए किए जा रहे कार्यों में योगदान देना चाहिए क्योंकि              भाषा की उन्नति में ही समग्र संस्कृति  की उन्नति छिपी होती है।

3 Responses to “राजभाषा हिंदी”

  1. सारथी चुनौतीपूर्ण उद्धरण 8 : सारथी Says:

    […] *** भारत का हित चाहने वाले और उसकी एकता और अखंडता को बनाए रखने वाले लोग ये समझते रहे हैं कि विभिन्नता के बावजूद भी भारत की राजभाषा हिंदी ही हो सकती है। यह सिर्फ़ भावुकता से कही गयी बात नहीं है, बल्कि ठोस आधार पर कही गयी बात है। [पूरा लेख पढें …] […]

  2. प्रेमलता पांडे Says:

    धन्यवाद।

  3. सारथी चुनौतीपूर्ण उद्धरण 8 | सारथी Says:

    […] *** भारत का हित चाहने वाले और उसकी एकता और अखंडता को बनाए रखने वाले लोग ये समझते रहे हैं कि विभिन्नता के बावजूद भी भारत की राजभाषा हिंदी ही हो सकती है। यह सिर्फ़ भावुकता से कही गयी बात नहीं है, बल्कि ठोस आधार पर कही गयी बात है। [पूरा लेख पढें …] […]

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