ग्रह और राशियाँ (ज्योतिष-२०)

हम  ज्योतिष में ग्रह और राशियों के बारे में प्राचीन मान्यताओं की बात कर रहे हैं। राशियों का परिचय हो चुका है। सभी राशियाँ पूर्व में क्षितिज पर उदित होती हैं। ज्योतिष के अनुसार कौनसी राशि अपने किस भाग से उदय होती है यह जान लेतेहैं –

राशि   =   उदय

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सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक और कुंभ =  शीर्षोदय।

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मेष, वृष, कर्क, धनु और मकर  =   पृष्ठोदय।

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मिथुन और मीन  =  उभयोदय।

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 ज्योतिष के अनुसार राशियों के स्वामियों के नाम पहले लिखे जा चुके हैं। हमने पढ़ा था कि सूर्य और चंद्रमा को छोड़कर सभी ग्रह  दो-दो राशियों पर अधिपत्य रखते हैं। पर इनमें से उनकी मूल त्रिकोण राशि कौन सी है ?  कितने अंश तक वे  कहाँ पर परमोच्च और कहाँ पर परमोच्च नहीं यानि झुके (यहाँ निम्न से अभिप्राय है कि उदित होने की स्थिति के हिसाब से ग्रह जिस राशि में पूर्ण रुपेण प्रशस्त न हो सकता हो) दृष्टिगोचर होते है यह जान लेते हैं- 

सूर्य

परमउच्चराशि = मेष १० अंश तक,

परमनिम्नराशि = तुला १०अंश तक,

मूलत्रिकोण = सिंह ० से २०अंश तक,                                                                                                

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चंद्रमा

परमउच्च = वृष ३अंश तक,

परमनिम्न = वृश्चिक ३अंश तक,

मूलत्रिकोण = वृष ३ से ३०अंश तक

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मंगल

परमोच्च = मकर २८ अंश तक,

परमनिम्न = कर्क२८अंश तक,

मूलत्रिकोण = मेष ० से १२अंश तक,

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बुध

परमोच्च = कन्या १५ अंश तक,

परमनिम्न = मीन १५ अंश तक,

मूलत्रिकोण = कन्या १५ से २०अंश तक।

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गुरु

परमोच्च = कर्क ५ अंश तक,

परम निम्न = मकर ५अंश तक,

मूलत्रिकोण =   धनु १० अंश तक।

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शुक्र

परमोच्च = मीन २७अंशतक,

परमनिम्न = कन्या २७ अंश तक,

मूलत्रिकोण = तुला ५अंश तक।

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शनि

परमोच्च = तुला २०अंश तक,

परमनिम्न = मेष २०अंश तक,

मूलत्रिकोण = कुंभ २०अंश तक।

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हमने देखा कि एक ग्रह जितने अंशों तक अपनीपरमोच्चता के साथ किसी राशि में दृष्टिगोचर होता है ठीक उतने ही अंशों तक वह उसके सामने  वाली राशि पर परम निम्न (उदित होकर ऊँचाई पर नहीं)  रह जाताहै।पमोच्चग्रह का आशय किसी ग्रह की दीप्त होने की स्थिति से है  इसीलिए परमोच्च ग्रह को सर्वाधिक फलदाता ग्रह माना गया है।

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अस्तग्रह

उदय का उल्टा है अस्त। लग्नकुण्डली के द्वितीय भाव में ग्रह बिल्कुलउदय होने वाला (तत्पर)  होता है ऐसा कहा गया है तो अष्टमभाव में अस्त (तत्पर) होने वाला। सप्तम भाव में ग्रह अस्त होने की ओर मुड़जाता  है तो षष्ठम भाव में   अस्त होने की ओर मुख कर लेता है। अस्तग्रह निष्फल होते हैं। ग्रह एक गोलाई सी लिए  मार्ग पर चलते हैं । घूमते हुए उनकी दिशा भी अवश्य ही बदलेगी। जब वह सीधे चलते है तो मार्गी और घूमकर उल्टी ओर चलते हैं तो वक्री  कहलाए गए हैं। सभी  ग्रह मार्गी और वक्री चलते हुए सूर्यके पास पृथक-पृथक अंशों तक   अस्त होते हैं-

ग्रह मार्गी चलते वक्री चलते
चंद्र १२ अंश
मंगल १७अंश ८अंश
बुध १४ अंश १२अंश
बृहस्पति ११अंश ११अंश
शुक्र १०अंश ८अंश
शनि १६अंश १६अंश

 विशेष बात यह है कि यदि ग्रह अस्त हो पर अपने मूलत्रिकोण/परमोच्च स्थिति में हो तो  विचित्र फल  देने वाले देखे गए हैं। किसी रुप में भारी हानि तो किसी एक रुप में बड़ा लाभ होते देखा गया है। फलित कर ते समय ग्रह की सभी अवस्थाओं को पूर्णरुपेण ध्यान में रखकर ही करना चाहिए। इस विषय में अन्य और  तथ्य भी हैं जो समय-समय पर लिखे जाएंगे।  

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