शनि (ज्योतिष- १८)

सूर्य के बारे में लिखते समय पुराणों के अनुसार सूर्य की दो सहचरियों कॆ नाम भी लिखे थे । उनमें से दूसरी सहचरी ‘छाया’  की संतान शनि माने गए हैं।

श्रीमद्भागवत -पुराण में गुरु से २लाख  योजन पर शनि दिखायी देने की बात कही गयी है। मंद गति के कारण इसका नाम शनि पड़ा- 

“तत उपरिष्टाद्योजनलक्षद्वयात्प्रतीयमानः  शनैश्चरएकैकस्मिन राशौ      त्रिशंशन्मासानविलम्बमानः सर्वानेवानुपर्येति तावद्भिरनुवत्सरैःप्रायेण हि सर्वेषामशान्तिकरः॥ 

 ज्योतिष में  इनकी दैनिक गति ८कला, ५विकला कही गयी है। समस्त राशियों का भ्रमण करने में यह २९ वर्ष, ५ मास, १७ दिवस, १२ घटी और ३०पल लगाते हैं। शनि को कालपुरुष का कष्ट कहा गया है। इन्हें प्रायः अशांतिकारक कहा गया है- “प्रायेण हि सर्वेषामशान्तिकरः”  मंगल, सूर्य औए चंद्रमा के साथ यह प्रभावशाली नहीं होता। शुक्र के साथ इसके प्रभाव में बढ़ोत्तरी होती है- ऐसा कहा गया है। गुरु और बुध के साथ यह समरस रहता है। इसीप्रकार तुला राशि में यह सर्वाधिक असरकारक और मेष में सर्वाधिक निःष्प्रभ  रहता है।  ज्योतिष में शनि को हमारे कर्मानुसार फल देने वाला ‘न्याय -कर्ता’  जैसा ग्रह कहा गया है। शनि एक गहरा प्रभाव (अच्छा/बुरा)  छोड़ने वाला  ग्रह कहा गया है। छाया से जन्म लेने के कारण काला और गहरा नीला रंग इसके प्रतीक रंग माने गए हैं। पुराणों  में इसकी अन्य ग्रहों की अपेक्षा दूरी का भी ज़िक्र मिलता है।  

One Response to “शनि (ज्योतिष- १८)”

  1. mukesh Says:

    shani 11 house me chandrma ke sath kesa parinam dega

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