चंद्रमा (ज्योतिष-१३)

   सूर्य की किरणों से एकलाख योजन ऊपर  चंद्र्मा है। यह समस्त जीवों का प्राण है। श्रीमद्भागवत पुराण में लिखा है-  

” य एष षोडशकलः पुरुषो भगवान्मनोमयोऽन्नमयोऽमृतमयो देवपितृमनुष्यभूतपशुपक्षिसरीसृपवीरुधां प्राणाप्यायनशीलत्वात्सर्वमय इति वर्णयन्ति॥” 

अर्थात ये सोलह कलाओं से युक्त मनोमय,  अन्नमय,  अमृतमय पुरुषस्वरुप  चंद्र्मा हैं –  ये  ही देवता, पितर, मनुष्य, भूत, पशु, पक्षी, सरीसृप और वृक्षादि का पोषण करते हैं;  इसलिए इन्हें सर्वमय भी  कहते हैं।  

चंद्र्मा को महर्षि अत्रि और  देवी अनसूया ( ज्योतिष के अनुसार  आकाश में तारे भी हैं और ऋषियों के भी नाम हैं।)    की संतान बताया गया है। यह कर्क राशि का स्वामी है। वृषराशि में उच्चता लिए रहता है। यह शीतलताप्रधान ग्रह  है। इसे कालपुरुष का मन कहा गया है। जब चंद्रमा आकाश में अधिक कलाओं से परिपूर्ण होता है तब वह ज़्यादा प्रभावशाली  माना गया है। सफेद और दूधिया रंग इसका प्रतीकरंग कहे गए हैं। इसकी दैनिक गति ७९० कला और १४ विकला कही गयी  है। यह माना गया है कि यह संपूर्ण राशियों  में ८७ दिन, १९ घटी, १७ पल और ४२ विपल में घूम लेता है। यह एक राशि में लगभग सवा दो दिन रहता है। जन्म के समय चंद्रमा जिस राशि में होता है उसको लग्न मानकर चंद्र्कुण्डली बनायी जाती है। यदि चंद्र-तिथि के अनुसार चंद्र्मा की कलाएँ आकाश में अधिक दिखायी दे रहीं हैं तो चंद्रकुण्डली का भी ज्योतिष में बहुत महत्त्व है।  लग्न के बाद चंद्र-कुण्डली से भी फलित किया जाता  है। ।   

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