सौरमास और ऋतुएँ (ज्योतिष-६)

सौर मास  

ज्योतिष में ब्रह्मांड का दर्शन पृथ्वी से किया गया हैं। अन्य पिण्ड और तारे घूमते बताए गए हैं इसतरह सूर्य  का राशि-संक्रमण मेषराशि से शुरु होकर मीनराशि तक बताया गया है; परंतु प्रतिदिन सूर्य का संक्रमण विपरीत अर्थात मेष से मीन की ओर बताया गया है। ( यह बात लग्न, ग्रह और राशियों के  संबंध और संचरण का ज़िक्र करते समय स्पष्ट करने की कोशिश की जाएगी।) इसका कारण पृथ्वी  का अपनी धुरी पर घुमते हुए सूर्य की परिक्रमा करना है।जिस मास में सूर्य जिस भी राशि में विचरण करता है उसी राशि के नाम पर उस महीने का सौर मास होता है अर्थात संक्रान्ति होती है। जैसे जनवरी में मकर-संक्रान्ति। 

अयन –

 मकर की संक्रांति से कर्क की संक्रांति तक सूर्य उत्तरायण और सिंह से धनु की संक्रांति  तक दक्षिणायन माने गए हैं।उत्तरायण को काल -पुरुष का दिन और दक्षिणायन को रात्रि समझा गया है।

 ऋतुएँ-

 एक वर्ष में छः ऋतुएँ  मानी गयी हैं। ज्योतिष के अनुसार चैत्रमास से शुरु करते हुए दो-दो मास की एक ऋतु के हिसाब से छः ऋतुएँ – बसंत, ग्रीष्म, वर्षा, शरद,हेमंत और शिशिरऋतु नाम रखे गए हैं। जिस वर्ष में अधिमास होता है उसमें (कोई) एक ऋतु ९०दिन की मानी गयी है। 

4 Responses to “सौरमास और ऋतुएँ (ज्योतिष-६)”

  1. प्रेमलता Says:

    सूर्य का राशि संचरण ही राशि संक्रमण का आशय है।

  2. रिपुदमन पचौरी Says:

    मास-संक्रमण : इसका क्या अर्थ हुआ ?

    रिपुदमन

  3. premlata Says:

    टिप्पणी हेतु धन्यवाद।

  4. रिपुदमन पचौरी Says:

    “जिस वर्ष में अधिमास होता है उसमें (कोई) एक ऋतु ९०दिन की मानी गयी है। ”

    yah baat pataa nahi thi. chaliye nirantar kuch naya pataa chal raha hai.

    shubh-kaamnaayen
    Ripudaman

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