तिथि और मास (ज्योतिष-५)

तिथि और मास 

ज्योतिष  में चंद्रमा की एक कला को तिथि कहते हैं। जब पृथ्वी से चंद्रमा,  सूर्य से १२ अंश आगे दिखायी पड़ता है तो एक तिथि पूरी मानी गयी  है। जब चंद्रमा ३६० अंश आगे पहुँच जाता है तब ३० तिथियाँ पूरी मानी जाती हैं। ३० तिथियों का एक चंद्र मास माना गया है। जब चंद्रमा सूर्य से १८० अंश की दूरी पर हो तो एक पक्ष पूरा  माना गया है। इसे पूर्णिमा कहा गया है और ३६०  अंश होने पर अमावस्या। पृथक बात यह है कि  भारतीय-ज्योतिष के अनुसार  चंद्रवर्ष ३५४ दिन का और चंद्रमास २७.५ तिथियों का होता है। कुल १२ चंद्रमास हैं। चंद्र्मासों के नाम चंद्रमा के नक्षत्रों में विचरने के आधार पर रखे गए हैं। पूर्णमासी के बाद चंद्रमा जिस नक्षत्र में प्रवेश करता है उसी के नाम पर चंद्रमास का नाम पड़ा है-

मास   =    नक्षत्र

……………………

चैत्र  =  चित्रा

……………………

वैशाख =  विशाखा,

……………………

ज्येष्ठ   =   ज्येष्ठा,

……………………

आषाढ़   =   पूर्वाषाढ़ा,

……………………

श्रावण   =   श्रवण,

…………………….

भाद्रपद   =   पूर्वाभाद्रपद,

……………………….

.आश्विन   =  अश्वनि,

………………………

कार्तिक =   कृतिका,

……………………….

.मार्गशीर्ष   =  मृगशिरा

,……………………………

पौष   =  पुष्य,

……………………………

माघ   =  मघा,

…………………………….

फाल्गुन   =  पूर्वाफाल्गुनी।

…………………………… 

विशेष –  ३२ मास, १६ दिवस और ४ घड़ी के बाद एक अधिवर्ष होता है। जब जिस चंद्र-महीने में दो संक्रांतियाँ होती हैं तो उसे क्षयमास और जब चंद्रमास में संक्रांति नहीं  होती है तो उस चंद्रमास को अधिमास कहते हैं।

2 Responses to “तिथि और मास (ज्योतिष-५)”

  1. pasand Says:

    धन्यवाद। अवश्य और शीघ्र लिखें…

  2. रिपुदमन पचौरी Says:

    अच्छा है…. जारी रखिये। आगे हम भि कुछ लिखना चाहेंगे।

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