साहस

तूफानों का साथ,
गहरी काली रात,
निर्भीक-शांत मन,
पहुँचने का प्रण,
यही है अभीष्ट अब,
मंजिल मिलेगी कब?

2 Responses to “साहस”

  1. MAN KI BAAT Says:

    मिश्र जी अपना उत्तर उसी श्लोक की टिप्पणी में लिख रही हूँ।
    -प्रेमलता

  2. RC Mishra Says:

    प्रेमलता जी सादर प्रणाम।
    ***********************************At गुरुवार, जुलाई १३, २००६ १२:०६:३६ अपराह्न, MAN KI BAAT said…
    गीता जी के अनुसार ‘युद्ध किससे है, कितना बूता है’ यह जानकर ही अग्रेषित होना चाहिए।
    -प्रेमलता पांडे
    ***********************************
    उपर्युक्त टिप्पणी से आपका आशय मै नही समझ सका, कृपया स्पष्ट करें।
    आपका ई मेल पता उपलब्ध न होने के कारण यह अवांछित टिप्पणी करनी पड़ रही है।
    धन्यवाद।

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