आतंकवाद

विश्व की समस्याओं की विषय-सूची में आतंकवाद प्रथम नंबर पर है। यूँ तो आस्ट्रिया के विरुद्ध सर्बों का संघर्ष भी उग्रवादी विचारधारा के रुप में ही जाना जाता है और यूरोप के (उच्चता के) घमंड ने ही १९३९ में विश्व-शांति को भंग किया था, परंतु आज जो आतंकवाद फैला हुआ है उसका और उन अशांतियों का कोई मिलान नहीं है।
आतंकवाद की जड़ें शीत-युद्ध के साथ ही जम गयीं थीं। जब बड़े-बड़े राष्ट्र अपने साथ मिलाने के लिए अन्य छोटे-छोटे देशों को हथियार पानी की तरह बहा रहे थे, हथियारों की मंडियाँ खुल रही थीं उस समय से ही आतंकवादियों को हथियार प्राप्य होने लगे थे। शीतयुद्ध के ठंडा होने के बाद ये हथियार तस्करी के रुप में इधर-उधर हो गये और आतंकवादियों के पास पहुँचते गये। पूँजीवाद के तेजी से बढ़ने, परंतु समान रुप में ना बढ़ने के कारण असमानता की खाई ज्यों की त्यों ही है। जब आतंकवादियों को धन की ज़रुरत पड़ी तो मादक पदार्थों की तस्करी करके धन कमाना शुरु कर दिया। मादक पदार्थों के व्यापार के लिए ग़रीब और कमज़ोर देशों को निशाना बनाया जाने लगा, जिस कारण से आतंकवाद को पनाह मिलती रही और कुत्सित कार्य होते रहे हैं।
भूमण्डलीकरण ने दूरियाँ बहुत पास कर दी हैं जो आतंकवादियों के लिए भी प्रभावकारी हैं। उनका जाल भी आसानी से फैल रहा है। सूचना-क्रांति का लाभ वे भी उठा रहे हैं। मादक-पदार्थों और अस्त्र-शस्त्रों की तस्करी असानी से हो रही है। वे अपने कार्यों को परिणाम तक पहुँचा रहे हैं।
सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक कमज़ोरियाँ , अशिक्षा के साथ-साथ नैतिकता का पतन अर्थात मानवीय-संवेदनाओं का धूमिल हो जाना दहशतगर्दों को फलने-फूलने का मौक़ा दे रहा है।
भ्रष्टाचार का तेजी से संपूर्ण विश्व में पनपना भी आतंकवादियों को पाल रहा है। स्वार्थ सिर्फ़ स्वार्थ, हर हाल में स्वार्थ आतंकवादियों के चारों ओर चक्रव्यूह बनने ही नहीं देता। सामाजिक विचारधाराएँ भी व्यक्तिगत चाशनी में पगी हुई सी हैं। धर्म (भगवान वाला नहीं,कर्तव्यपरायणता) अप्रचलित हो गया है तो पाप करने वाले ही बढ़ेंगे-
‘जब-जब होय धर्म की हानि,
बाढ़ैहिं असुर, अधम-अज्ञानी।’
आतंकवाद को हिलाने और मिटाने के लिए समानता की विचारधारा को ही ओढ़ना और बिछाना पड़ेगा। भौतिक सुखों में कटौती करके ज़रुरतमंदों की क्षुधा शांत करनी होगी वरना ‘भूखा कौन सा पाप नहीं कर सकता’ जैसी लोकोक्तियाँ चरितार्थ रहेंगी। बीमारी लाइलाज जैसी है जिसके ठीक होने में बहुत समय और इलाज की आवश्यकता होगी। धैर्य, सहनशीलता और एकजुटता के साथ-साथ सजगता भी रखनी पड़ेगी, तभी हम अजगर को जकड़ पाएंगे।

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4 Responses to “आतंकवाद”

  1. MAN KI BAAT Says:

    अनूप शुक्लाजी, सृजन शिल्पीजी और अज्ञात जी धन्यवाद।
    -प्रेमलता

  2. Anonymous Says:

    article is praise-worthy.

  3. Srijan Shilpi Says:

    यह संसार तो पदानुक्रम पर आधारित है। अमीबा से लेकर ब्रह्मा तक सारी व्यवस्था पदानुक्रम के साँचे में ढली हुई है। समानता इस धरती पर कब साकार हो सकेगी, कह पाना मुश्किल है। आतंकवाद, अशांति और युद्ध का सिलसिला तभी रूकेगा जब यह दुनिया समानता, स्वतंत्रता और मित्रता की बुनियाद पर विकसित होगी।

  4. अनूप शुक्ला Says:

    यह बात सच है कि जब तक असमानता रहेगी तब तक आतंकवाद किसी न किसी रूप में रहेगा!

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