तू बटोही क्यों रुका है

आकाश तारों से खिला है,
चंद्रमा उसमें चला है,
तू बटोही क्यों रुका है ?
अपनी राह क्यों नहीं चला है ?
रुककर खड़ा ना रह पाएगा,
तूफ़ानों में घिर जाएगा।
आँधियां उड़ा देती हैं,
रुकने वाले को ज़बरन चला देती हैं।
राह भी भूल जाएगा,
इधर-उधर भटका रह जाएगा।
चारों ओर देख ले,
मन में अपने सोच ले,
क्या कभी कोई रुका है ?
बिना चले ही टिका है ?
मंज़िल पर पहुंचना तो है,
अभीष्ट को पाना भी है,
फिर क्यों सोचता है ?
अपनी राह छोड़ता है,
चल आगे आगे चल,
अपने आप मिट जाएगा छल,
चलते-चलते ना जाने कब
निकल आएगा दिन।

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6 Responses to “तू बटोही क्यों रुका है”

  1. रजनीश मंगला Says:

    अच्छी कविता है प्रेमलता जी।

  2. रत्ना Says:

    भाव सुन्दर है

  3. MAN KI BAAT Says:

    प्रतीक,ई-शैडो और समीर भाई पंक्तियाँ अच्छी लगीं बहुत बहुत धंयवाद।
    प्रेमलता पांडे

  4. Udan Tashtari Says:

    बहुत बढिया, हमेशा की तरह एक नया स्वरुप लिये.

    समीर लाल

  5. ई-छाया Says:

    चलते-चलते ना जाने कब
    निकल आएगा दिन।

    बहुत सुन्दर प्रेरणादायक कविता है।

  6. Pratik Says:

    प्रेमलता जी, आपकी यह उत्साहवर्धक कविता बहुत अच्छी लगी।

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