सौंदर्य-बोध

उनको हर चीज सुंदर लगती है,
जीवन में खुशियां हीं खुशियां भरती हैं।
नदियां नाचती नज़र आती हैं,
किनारों को छूती लहर मानों पास बुलातीं हैं।
कुंजवनों की छटाएं लुभाती हैं,
चिड़ियां चहक-चहक कर मन बहलातीं हैं।
पर्वत, दर्रे, घाटी सभी तो स्वर्ग से लगते हैं,
उनको क़दम-क़दम पर छलते हैं।
छोटी सी बरसात की बूंद भी मोती दिखायी देती है,
पृथ्वी पर फैली हरी घास भी मखमल लगती है।
व्योम भी भरा-भरा प्रतीत होता है,
तारों का जमघट बिखरे मोती सा लगता है।
पर मुझे कुछ इतना नहीं भाता है,
ठीक है हरेक पृथ्वी को सजाता है,
पर मेरे मन में इतनी गुदगुदी नहीं कर पाता है।
उनके वर्णन सुनकर मेरा मन कुछ यूं बुदबुदाता है:
मैं मन में इतनी मोहकता कैसे जगाऊं?
अपनी आत्मा को सौंदर्य से कैसे मिलवाऊं?
भूख कुछ सोचने ही नहीं देती है,
निर्धनता सारी मोहकता छीन लेती है।
जब पेट भर खाना मिला हो जीवन में,
तभी सौंदर्य दिखायी देता है हर कण में।
यहां तो लुभाता है बस दो जून खाना,
स्वर्ग बन जाता है झोंपड़ी और चिथड़े में तन सजाना।

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2 Responses to “सौंदर्य-बोध”

  1. कुछ इधर-उधर की… « पसंद Says:

    […] होती है तो अमीर को भोग की। इस पर एक कविता लिखी थी, कविता पर याद आया कि मसालेदार […]

  2. Hitendra Says:

    बहुत बढ़िया, बहुत सुंदर

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