कुछ धृष्टता की है जो मेरे दूसरे ब्लॉग मन की बात पर पढ़ी जा सकती है।
बहुत दिनों से लिख रही हूँ और सोच रही हूँ कि प्रकाशित कर दूँ पर जब हो जाए तभी ठीक है।
( वहाँ मैं अपनी सोच ही लिखूंगी। मेरे विचार में गीता धर्म और संप्रदाय जैसे शब्दों से ऊपर जीने की कला है, मनोबल वृद्धि का सामान है। अपनी सोच रख रही हूँ बस)